
Ahmedabad, 23 सितंबर . देश में दवाओं की कीमतों को लेकर एक बड़ा और चौंकाने वाला खुलासा हुआ है. Gujarat केमिस्ट्स एंड ड्रगिस्ट्स एसोसिएशन के प्रमुख जसवंत पटेल ने दवा कंपनियों, कॉर्पोरेट हॉस्पिटलों और डॉक्टरों के बीच चल रहे करोड़ों रुपये के गठजोड़ का पर्दाफाश किया है.
उन्होंने आरोप लगाया कि कंपनियां छोटे केमिस्ट को 2 प्रतिशत मार्जिन देने में भी आनाकानी करती हैं, वहीं बड़ी चेन स्टोर्स और अपोलो जैसे कॉर्पोरेट हॉस्पिटलों को 30 से 50 प्रतिशत तक अतिरिक्त कमीशन दिया जा रहा है. अगर दवा कंपनियों की गठजोड़ की सही से जांच की जाए तो बड़ा खुलासा होगा. अगर इसकी सीबीआई जांच हो तो अपोलो समेत कई बड़ी कॉर्पोरेट हॉस्पिटल चेन का नेक्सस सामने आएगा. हमारा मार्जिन फिक्स है, एक छोटे व्यापारी को 2 फीसदी ज्यादा देने में भी कंपनी को दिक्कत होती है, लेकिन चेन स्टोर्स और कॉर्पोरेट हॉस्पिटलों को 30 से 50 प्रतिशत तक एक्स्ट्रा मार्जिन दिया जाता है.
उन्होंने कहा कि कॉर्पोरेट हॉस्पिटलों में होने वाली खरीद में भी 30-50 फीसदी अतिरिक्त मार्जिन दी जाती है. डॉक्टरों के साथ सांठगांठ में तो खेल और बड़ा है. कैंसर जैसी दवाओं में एमआरपी और पीटीएस (प्राइस टू स्टॉकिस्ट) के बीच भारी अंतर होता है. डिस्ट्रीब्यूटर को 5 फीसदी भी ज्यादा नहीं मिलता, लेकिन बीच के इस अंतर में करोड़ों रुपये का घोटाला होता है. मैं Supreme Court के जजों को धन्यवाद देता हूं. ये मामला कई सालों से चल रहा है. दवा कंपनियां जो एमआरपी तय करती हैं, उसमें बहुत बड़ा खेल है. चाहे कैंसर की दवाएं हों, इमरजेंसी में इस्तेमाल होने वाले हार्ट के इंजेक्शन हों, नेफ्रो के इंजेक्शन हों या कोई भी इमरजेंसी ड्रग हो, इनकी एमआरपी बहुत ज्यादा रखी जाती है, जबकि लागत बहुत कम होती है.
उन्होंने कहा कि ये दवाएं आम केमिस्ट की दुकान पर बिकती ही नहीं हैं. हमारा मार्जिन तो सेंट्रल ड्रग प्राइस कंट्रोल ऑर्डर के तहत फिक्स है और एमआरपी नेशनल फार्मास्युटिकल प्राइसिंग अथॉरिटी (एनपीपीए) तय करती है. लेकिन इसमें Government को एक एमएपीई फिक्स करना पड़ेगा. पेटेंटेड प्रोडक्ट में भी एमआरपी में काफी अंतर होता है, तो वहां भी रेट को कंट्रोल करना पड़ेगा. Government को इस पर कानून बनाना होगा कि पीटीएस (प्राइस टू स्टॉकिस्ट), पीटीआर (प्राइस टू रिटेलर) और एमआरपी के बीच जो अंतर है, उसे खत्म किया जाए. नियम के मुताबिक रिटेल मार्जिन 20 प्रतिशत और होलसेल मार्जिन 10 प्रतिशत है, लेकिन हकीकत में 27 रुपये की एमआरपी वाली दवा 27,000 रुपये में बिक रही है. ऐसे कई प्रोडक्ट हैं, मेरे पास पूरी लिस्ट है.
उन्होंने आगे बताया कि कोरोना के दौरान इस्तेमाल हुई कई एंटीबायोटिक दवाएं सीधे अस्पतालों में इस्तेमाल हुईं. पूरे हिंदुस्तान में करीब 200 ऐसे डिस्ट्रीब्यूटर हैं, जो स्पेशियलिटी प्रोडक्ट में डील करते हैं और सीधे डॉक्टरों से जुड़े हैं. डॉक्टरों के अपने मेडिकल स्टोर्स हैं, जहां उनके रिश्तेदार बैठे हैं, और अस्पतालों के अंदर जो स्टोर्स हैं, वहां भी यही धंधा चल रहा है. वहां जमकर वसूली हो रही है. एमआरपी पर कंट्रोल नहीं है. अगर एमआरपी से ज्यादा लिया जाए तो गुनाह बनता है, लेकिन एमआरपी के अंदर ही लूट हो रही है तो उस पर कोई कानून नहीं है.
जसवंत पटेल ने कहा कि एनपीपीए को ही ये सब तय करना पड़ेगा और इसके लिए कानून बनाना पड़ेगा. मध्यम और गरीब वर्ग के लोग अपनी जमीन-जायदाद बेचकर इलाज करा रहे हैं और दवाओं का बिल इतना बड़ा आता है, ये बहुत दुखद है. ज्यादातर कैंसर में इस्तेमाल होने वाली डोज की कीमत 90 हजार से एक लाख रुपये तक होती है. बॉडी की इम्यूनिटी बढ़ाने के लिए 5-6 डोज लेने पड़ते हैं, जिनका एक डोज 80-90 हजार रुपये का होता है. इसमें काफी एडजस्टमेंट होता है.
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केके/एबीएम