
Mumbai , 20 सितंबर . टाटा ट्रस्ट्स ने Sunday को यह कहते हुए टाटा संस के चेयरमैन के रूप में एन.चंद्रशेखरन की दोबारा नियुक्ति को चुनौती दी कि आर्टिकल्स ऑफ एसोसिएशन (एओए) के तहत, किसी भी प्रस्ताव के पास होने के लिए टाटा ट्रस्ट्स की ओर से नामित डायरेक्टर्स का बहुलता में वोट होना आवश्यक है, जो कि इस प्रस्ताव को नहीं मिला.
टाटा संस में 66 प्रतिशत की हिस्सेदारी रखने वाले टाटा ट्रस्ट्स ने अपने बयान में कहा कि टाटा संस के बोर्ड में ट्रस्ट्स की ओर से दो नामित डायरेक्टर्स हैं और किसी भी प्रस्ताव को पास करने के लिए दोनों का पक्ष में होना जरूरी है और 17 सितंबर को हुई बोर्ड बैठक में चंद्रशेखरन की दोबारा नियुक्ति के प्रस्ताव खिलाफ एक डायरेक्टर ने विपक्ष में वोट दिया था, जो दिखाता है कि एओए में दी गई शर्त पूरी नहीं हुई है.
बयान में आगे कहा गया कि टाटा संस के बोर्ड में दो टाटा ट्रस्ट्स के नामित डायरेक्टर्स हैं और बहुलता का मतलब दो है न कि एक.
ट्रस्ट्स ने ग्रुप के अंदर कोई गतिरोध होने से इनकार करते हुए कहा कि बोर्ड ने एक सवाल पूछा और एओए ने उसका जवाब ‘नहीं’ में दिया. कंपनी के अपने संविधान से मिले सुरक्षा के अधिकार का इस्तेमाल करना कोई गतिरोध नहीं है. यह तो बस उस संविधान का उसी तरह काम करना है, जिस तरह उसे काम करने के लिए बनाया गया था.
चेयरमैन के वोटिंग अधिकार पर स्पष्टीकरण देते हुए ट्रस्ट्स ने आगे कहा कि चेयरमैन का वोट तभी इस्तेमाल किया जा सकता है जब पूरे बोर्ड के स्तर पर वोट बराबर हों. यह नियम टाटा ट्रस्ट्स के नॉमिनी डायरेक्टर्स पर लागू नहीं होता. वोट का नतीजा 4:1 था या कुछ और, इससे कोई फर्क नहीं पड़ता. केवल महत्वपूर्व यह था कि शर्त या तो पूरी होती है या नहीं होती, इस मामले में शर्त पूरी नहीं हुई.
टाटा ट्रस्ट्स के मुताबिक, एओए कोई ऐसी सुविधा नहीं है जिस पर जरूरत पड़ने पर तो भरोसा किया जाए और जरूरत न होने पर उसे नजरअंदाज कर दिया जाए.
टाटा संस ऐसा रुख नहीं अपना सकती, क्योंकि वह पहले ही इसके उलट रुख अपना चुकी है और Supreme Court में जीत भी चुकी है. साइरस मिस्त्री को हटाए जाने से जुड़ी कार्यवाही में, आर्टिकल 104बी और 121 के तहत ट्रस्ट के नॉमिनी डायरेक्टरों के ‘अफर्मेटिव वोटिंग राइट्स’ (सहमति वाले वोटिंग अधिकार) मुख्य मुद्दा थे. नेशनल कंपनी लॉ अपीलेट ट्रिब्यूनल ने इन्हें दमनकारी माना और शिकायत करने वालों ने मांग की कि इन्हें हटा दिया जाए या सीमित कर दिया जाए.
उस दौरान टाटा संस ने उस कोशिश का विरोध किया. उसने इन अधिकारों का बचाव करते हुए कहा कि ये शेयरहोल्डर्स के बीच तय की गई एक जायज सुरक्षा व्यवस्था है. साथ ही, कंपनी ने तर्क दिया कि ये अधिकार दमनकारी होने के बजाय, असल में एक मेजॉरिटी शेयरहोल्डर के तौर पर ट्रस्ट्स का हक हैं. India के Supreme Court ने कंपनी का पक्ष माना और उस फैसले को रद्द कर दिया जिसमें इन आर्टिकल्स को दमनकारी बताया गया था. कंपनी अब उस सुरक्षा से पीछे नहीं हट सकती जिसे बनाए रखने के लिए वह Supreme Court गई थी.
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एबीएस