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Monday, 19 October 2026
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जॉन ब्रिटास ने राष्ट्रपति को लिखा पत्र, जेएनयू में छात्रसंघ की भूख हड़ताल में हस्तक्षेप की मांग

जॉन ब्रिटास ने President को लिखा पत्र, जेएनयू में छात्रसंघ की भूख हड़ताल में हस्तक्षेप की मांग

New Delhi, 18 अक्टूबर . केरल से सीपीआई (एम) के राज्यसभा जॉन ब्रिटास ने जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय (जेएनयू) की विजिटर के रूप में India की President को पत्र लिखा है. ब्रिटास ने उनसे जेएनयूएसयू प्रतिनिधियों और अन्य छात्रों द्वारा 3 अक्टूबर, 2026 से शुरू हुई अनिश्चितकालीन भूख हड़ताल में तत्काल हस्तक्षेप की मांग की है.

उन्होंने निर्वाचित छात्र संघ प्रतिनिधियों के खिलाफ निष्कासन आदेशों को रद्द करने, मुख्य प्रॉक्टर कार्यालय (सीपीओ) नियमावली के आपत्तिजनक प्रावधानों को वापस लेने और छात्रों की लंबे समय से चली आ रही शिकायतों के समाधान का आग्रह किया है.

शिक्षा मंत्री को लिखे एक अलग पत्र में, उन्होंने भूख हड़तालियों के बिगड़ते स्वास्थ्य और परिसर में लोकतांत्रिक भागीदारी पर लंबे समय तक चलने वाली अनुशासनात्मक कार्रवाई के प्रभावों पर चिंता व्यक्त की है और छात्र कल्याण की रक्षा और शीघ्र समाधान सुनिश्चित करने के लिए विश्वविद्यालय प्रशासन के साथ तत्काल बातचीत करने का आग्रह किया है.

ब्रिटास ने social media प्लेटफॉर्म एक्स पर राज्यसभा कार्यवाही की एक वीडियो शेयर करते हुए लिखा कि प्रसिद्ध Political वैज्ञानिकों स्टीवन लेविट्स्की और डैनियल जिब्लैट ने लिखा है कि आज की दुनिया में लोकतंत्र सैन्य तख्तापलट या विदेशी आक्रमणों से नहीं गिरते. बल्कि, लोकतंत्र भीतर से ही नष्ट हो जाता है जब लोकतांत्रिक प्रक्रियाओं द्वारा चुने गए नेता सत्ता में बने रहने के लिए कानूनों और संवैधानिक संस्थाओं का दुरुपयोग करते हैं. उन्होंने यह बात 2018 में लिखी थी.

उन्होंने कहा कि इस दिशा में पहला कदम केंद्र Government द्वारा दिसंबर 2023 में पेश किया गया मुख्य चुनाव आयुक्त एवं अन्य चुनाव आयुक्त (नियुक्ति, सेवा शर्तें एवं कार्यकाल) विधेयक था. जब इसे राज्यसभा में प्रस्तुत किया गया, तो हमने इसका स्पष्ट विरोध किया और इसकी गंभीर खामियों को उजागर करते हुए सदन में Government को चेतावनी दी कि इसके पारित होने से विनाशकारी परिणाम होंगे. आज, विधेयक के कानून बनने के दो साल बाद, उस समय उठाए गए मुद्दे पूरी तरह से सच साबित हो चुके हैं. लोकतंत्र को पुनः प्राप्त करने का यह ऐतिहासिक संघर्ष आज उसी कानून का प्रत्यक्ष परिणाम है.

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एमएस/

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