जन्माष्टमी विशेष : देश के प्रसिद्ध कृष्ण मंदिर, जिनके पीछे छिपी हैं पौराणिक और ऐतिहासिक कहानियां

New Delhi, 2 सितंबर . भारतीय संस्कृति और आध्यात्मिक परंपरा में भगवान श्रीकृष्ण का विशेष स्थान है. उनके जीवन, लीलाओं और शिक्षाओं से जुड़े अनेक मंदिर देश के अलग-अलग राज्यों में आस्था का विशेष महत्व रखते हैं. इन मंदिरों की विशेषता केवल उनकी भव्यता या धार्मिक महत्व तक सीमित नहीं है, इनके पीछे पौराणिक कथाएं भी प्रचलित हैं.

अनंत वासुदेव मंदिर : भुवनेश्वर में स्थित यह मंदिर बिंदु सरोवर और लिंगराज मंदिर के निकट है, जिसमें भगवान (कृष्ण), भगवान अनंत (बलराम) और देवी सुभद्रा की पूजा की जाती है. मंदिर की मुख्य विशेषता यहां का महाप्रसाद है. इसे मिट्टी के बर्तन में चूल्हे पर पकाया जाता है. पूर्वी गंगा वंश की रानी चंद्रिका देवी ने 13वीं शताब्दी में अनंत वासुदेव मंदिर का निर्माण करवाया था. हालांकि, मंदिर को लेकर मान्यता है कि पहले भी इसी स्थान पर भगवान विष्णु की मूर्ति की पूजा की जाती थी. 17वीं शताब्दी के उत्तरार्ध में मराठों ने इस मंदिर का जीर्णोद्धार करवाया, जिन्होंने तब तक Odisha (पूर्ववर्ती कलिंग) तक अपना शासन फैला लिया था. यहां जन्माष्टमी बड़े उत्साह के साथ मनाया जाता है. इस दिन मंदिर को फूलों और दीपों से खूबसूरती से सजाया जाता है.

इस्कॉन मायापुर, पश्चिम बंगाल : यह मंदिर गौड़ीय वैष्णव संप्रदाय का पवित्र केंद्र माना जाता है. 15वीं शताब्दी में चैतन्य महाप्रभु ने यहीं से ‘संकीर्तन आंदोलन’ (हरे कृष्ण महामंत्र का प्रचार) की शुरुआत की थी. बताया जाता है कि वर्तमान में मायापुर में दुनिया का सबसे बड़ा वैदिक मंदिर बनकर तैयार हो रहा है. इस विशाल मंदिर के निर्माण का सपना श्रील प्रभुपाद का था.

नवद्वीप धाम : सन 1486 में फाल्गुन पूर्णिमा के दिन नदिया (पश्चिम बंगाल) के नवद्वीप धाम में चैतन्य महाप्रभु का जन्म हुआ था. गौड़ीय संप्रदाय के शास्त्रों के अनुसार, नवद्वीप को ‘गुप्त वृंदावन’ कहा जाता है. माना जाता है कि भगवान श्री कृष्ण ने राधा रानी के भावों को समझने और स्वयं एक भक्त का आनंद लेने के लिए चैतन्य महाप्रभु के रूप में अवतार लिया था. महाप्रभु ने नवद्वीप की गलियों से ही मृदंग और करताल के साथ ‘हरे कृष्ण’ महामंत्र का सामूहिक कीर्तन शुरू किया था. मात्र 24 वर्ष की आयु में, चैतन्य महाप्रभु ने नवद्वीप के कटवा नामक स्थान पर केशव भारती से संन्यास की दीक्षा ली और उनका नाम ‘कृष्ण चैतन्य’ पड़ा. जब वे नवद्वीप छोड़कर जा रहे थे, तो पूरे नदिया क्षेत्र में शोक छा गया था. उनकी पत्नी विष्णुप्रिया और माता शची देवी के विरह की कहानियां आज भी इस क्षेत्र के लोकगीतों और इतिहास में अमर हैं.

द्वारकाधीश गोपाल मंदिर (उज्जैन) : यह मंदिर अपने ऐतिहासिक और चमत्कारी चांदी के दरवाजों के लिए प्रचलित है. मंदिर का निर्माण 19वीं शताब्दी में मराठा शासक दौलतराव सिंधिया की पत्नी बायजाबाई शिंदे ने करवाया था. यह संरचना पहले सिंधिया राजघराने की संपत्ति थी, जिसे बाद में भगवान श्रीकृष्ण के मंदिर के रूप में स्थापित किया गया. आज यह मंदिर भक्ति, इतिहास और मराठा वास्तुकला का अद्भुत प्रतीक है.

इस मंदिर के पीछे एक और विशेष परंपरा जुड़ी है, जिसे ‘हरिहर पर्व’ कहा जाता है. मान्यता है कि साल में एक बार जन्माष्टमी या उसके आस-पास के विशेष अवसरों पर राजा महाकाल (शिव) की सवारी रात के समय इस गोपाल मंदिर में आती है. स्थानीय लोगों का कहना है कि इस पर्व पर हरि (भगवान कृष्ण) और हर (भगवान शिव) का मिलन होता है और कई घंटों तक विशेष पूजा-अर्चना चलती है. मंदिर का मुख्य आकर्षण चांदी का दरवाजा है.

एनएस/एबीएम

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