चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति में पारदर्शिता और संस्थागत स्वतंत्रता का सवाल महत्वपूर्ण : शशांक रत्नू

New Delhi, 23 सितंबर . चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति से जुड़े मामले में Supreme Court की सुनवाई पर एडवोकेट शशांक रत्नू ने प्रतिक्रिया दी. उन्होंने कहा कि अदालत ने नियुक्ति प्रक्रिया और कमेटी की संरचना को लेकर गंभीर सवाल उठाए हैं. Supreme Court ने इस मामले की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि पर भी विस्तार से चर्चा की है.

एडवोकेट शशांक रत्नू ने कहा, “उनका जजमेंट यही है कि ऐसा नहीं होना चाहिए. कमेटी बिल्कुल क्लियर होनी चाहिए और वह मामले की गहराई में गए हैं.”

उन्होंने कहा कि फैसले में डॉ. भीमराव आंबेडकर के भाषणों, संविधान सभा की चर्चाओं और उस समय पैदा हुए संवैधानिक वैक्यूम का भी विस्तार से उल्लेख किया गया है.

उन्होंने कहा कि अब आगे की कानूनी स्थिति में पांच जजों की पीठ की भूमिका महत्वपूर्ण होगी. रत्नू ने सवाल उठाया कि क्या इस तरह के गंभीर संवैधानिक मामलों को बार-बार लंबित रखने का अवसर दिया जाना चाहिए?

रत्नू ने कहा कि इस मामले में तीन महत्वपूर्ण पहलू हैं. पहले ही पांच जजों की पीठ का फैसला आ चुका है, जिसमें प्रो-टेम कमेटी बनाए जाने और उसमें India के मुख्य न्यायाधीश को शामिल किए जाने की बात कही गई थी. उन्होंने कहा कि Prime Minister की बात को संबंधित मंत्री द्वारा नहीं टालने की Political वास्तविकता को देखते हुए नियुक्ति प्रक्रिया की स्वतंत्रता को लेकर सवाल उठते हैं.

Supreme Court के न्यायमूर्ति दीपांकर दत्ता की टिप्पणी का उल्लेख करते हुए रत्नू ने कहा कि उन्होंने नियुक्ति व्यवस्था पर कड़ी टिप्पणी की है. न्यायमूर्ति दत्ता ने प्रथम दृष्टया इसे गलत बताया और कहा कि ऐसी व्यवस्था नहीं होनी चाहिए. फैसले में Government की ओर से पेश किए गए कुछ तर्कों पर भी टिप्पणी की गई है. उन्होंने बताया कि न्यायमूर्ति दत्ता ने ‘जजेस अपॉइंट जजेस’ वाली धारणा को एक भ्रम बताया और कॉलेजियम की सिफारिशों को रोकने तथा उसमें हस्तक्षेप से जुड़े सवाल भी उठाए.

उन्होंने कहा कि फैसला काफी तल्ख और सख्त टिप्पणियों वाला है. चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति जैसी संवैधानिक प्रक्रिया में पारदर्शिता और संस्थागत स्वतंत्रता का सवाल महत्वपूर्ण बना हुआ है.

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एसएके/एबीएम

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