
New Delhi, 9 अक्टूबर . शारदीय नवरात्र का पावन पर्व जल्द ही शुरू होने वाला है. इस वर्ष 10 अक्टूबर को महालया है, जिसके अगले दिन यानी 11 अक्टूबर से नवरात्र का शुभारंभ हो रहा है. नौ दिनों तक चलने वाले इस विशेष अनुष्ठान में शक्ति की देवी मां दुर्गा के नौ रूपों की विशेष पूजा-अर्चना की जाती है. धार्मिक मान्यता के अनुसार, महालया के दिन मां दुर्गा का पृथ्वी पर आगमन हुआ था, जिसके बाद उन्होंने नौ दिनों तक चले भीषण युद्ध में महिषासुर नाम के असुर का वध किया था.
पौराणिक कथाओं के अनुसार, महिषासुर नामक राक्षस का जन्म रंभा और भैंस (महिषी) के मिलन से हुआ था, इसलिए वह आधा मनुष्य और आधा भैंस था. महिषासुर सृष्टिकर्ता ब्रह्मा का महान भक्त था और ब्रह्मा जी ने उसे वरदान दिया था कि कोई भी देवता या दानव उस पर विजय प्राप्त नहीं कर सकता.
महिषासुर बाद में स्वर्ग लोक के देवताओं को परेशान करने लगा और पृथ्वी पर भी उत्पात मचाने लगा. उसने स्वर्ग पर एक बार अचानक आक्रमण कर दिया और इंद्र को परास्त कर स्वर्ग पर कब्ज़ा कर लिया तथा सभी देवताओं को वहां से खदेड़ दिया. देवगण परेशान होकर त्रिमूर्ति ब्रह्मा, विष्णु और महेश के पास सहायता के लिए पहुंचे. सारे देवताओं ने फिर से मिलकर उसे परास्त करने के लिए युद्ध किया, परंतु वे फिर हार गए.
कोई अन्य उपाय न देखकर देवताओं ने महिषासुर के संहार के लिए देवी दुर्गा का आह्वान किया, जिन्हें आदिशक्ति और माता पार्वती के नाम से भी जाना जाता है. वह शिव के त्रिशूल, विष्णु के चक्र, हिमालय के सिंह और वायु के धनुष-बाण से सुसज्जित थीं. सभी देवताओं की संयुक्त शक्ति और क्रोध से परिपूर्ण देवी का रूप इतना भयंकर था कि उनके दर्शन मात्र से ही राक्षस भयभीत हो जाते थे.
मां दुर्गा ने महिषासुर पर आक्रमण कर लगातार नौ दिनों तक घोर युद्ध किया. पौराणिक कथा के अनुसार, महिषासुर ने भी अत्यंत वीरतापूर्वक युद्ध का सामना किया. इस दौरान उसने मायावी रूप बदलते हुए भैंस, सिंह, मानव, हाथी और अंत में पुनः भैंस का रूप धारण किया. युद्ध के दसवें दिन मां दुर्गा ने महिषासुर को अपने पैरों तले रौंदते हुए त्रिशूल से उस पर घातक प्रहार किया.
असहाय होकर महिषासुर ने अपनी रक्षा के लिए पुनः मनुष्य रूप में आने का प्रयास किया, लेकिन वह केवल कमर तक ही प्रकट हो सका. इसी क्षण देवी ने उसका वध कर दिया. इस महान विजय के उपलक्ष्य में हिंदू समाज दस दिवसीय ‘दुर्गा पूजा’ का महापर्व मनाता है. इसके दसवें दिन को ‘विजयादशमी’ के रूप में जाना जाता है, जो अधर्म पर धर्म और बुराई पर अच्छाई की जीत का प्रतीक है.
महिषासुर अपनी शक्ति और वरदान के नशे में चूर था, लेकिन उसका अहंकार ही उसके विनाश का कारण बना. यह संदेश मिलता है कि अत्यधिक अहंकार का पतन तय है. महिषासुर हमारे भीतर की इच्छाओं की कभी न खत्म होने वाली शृंखला का प्रतीक है. एक इच्छा पूरी होने पर दूसरी उत्पन्न हो जाती है और उसकी जगह ले लेती है. इन पर नियंत्रण ही वास्तविक विजय है.
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ओपी/एएस