
कोटद्वार, 25 सितंबर . उत्तराखंड विधानसभा की स्पीकर और कोटद्वार की विधायक रितु खंडूरी भूषण ने दक्षिण अफ्रीका के केप टाउन में 13 से 19 सितंबर तक आयोजित 69वें कॉमनवेल्थ पार्लियामेंट्री कॉन्फ्रेंस में India और उत्तराखंड का प्रतिनिधित्व किया. सम्मेलन में आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (एआई), जलवायु परिवर्तन, इंटरजेनरेशनल इक्वलिटी और राजनीति में महिलाओं एवं युवाओं की भागीदारी जैसे मुद्दों पर चर्चा हुई.
रितु खंडूरी भूषण ने को बताया कि वह पांचवीं बार कॉमनवेल्थ पार्लियामेंट्री एसोसिएशन में India का प्रतिनिधित्व कर रही हैं. Lok Sabha अध्यक्ष ओम बिरला का आभार जताते हुए उन्होंने कहा कि उन्हें एग्जीक्यूटिव कमेटी में नामित किया गया और India की ओर से सम्मेलन में अपनी बात रखने का अवसर मिला. दक्षिण अफ्रीका में उनका अनुभव काफी अच्छा रहा और विभिन्न देशों के प्रतिनिधियों के साथ कई महत्वपूर्ण विषयों पर चर्चा हुई. उन्हें कॉमनवेल्थ वुमन पार्लियामेंटेरियन्स की पीढ़ियों के बीच समानता (इंटरजेनरेशनल इक्वलिटी) से जुड़ी चर्चा की अध्यक्षता करने का अवसर मिला. इसमें कनाडा और बांग्लादेश समेत कई देशों के प्रतिनिधि शामिल थे.
उन्होंने कहा कि चर्चा में इस बात पर विचार हुआ कि युवाओं को संसद और राजनीति की ओर किस तरह आकर्षित किया जाए. युवाओं को किस तरह की शिक्षा और प्रशिक्षण दिया जाए, ताकि वे आगे चलकर संसद और राजनीति में आकर बदलाव ला सकें, इस पर विभिन्न देशों ने अपने अनुभव साझा किए.
सम्मेलन में जेंडर पैरिटी यानी महिलाओं की समान भागीदारी पर भी चर्चा हुई. रितु खंडूरी ने India और उत्तराखंड का उदाहरण देते हुए बताया कि देश में महिलाओं के लिए 33 प्रतिशत आरक्षण की व्यवस्था है, जबकि उत्तराखंड में जिला पंचायत स्तर पर 50 प्रतिशत आरक्षण दिया जाता है. इसके कारण स्थानीय निकायों में मेयर, जिला पंचायत अध्यक्ष, ब्लॉक प्रमुख, जिला पंचायत सदस्य, बीडीसी सदस्य और वार्ड सदस्य समेत कई पदों पर महिलाओं की भागीदारी देखने को मिल रही है. सम्मेलन में अलग-अलग देशों की ओर से अपनाई जा रही बेस्ट प्रैक्टिसेज को भी साझा किया गया.
जलवायु परिवर्तन पर हुई चर्चा में रितु खंडूरी ने उत्तराखंड की पारंपरिक खेती के ‘बारह अनाज’ सिस्टम का उल्लेख किया. उन्होंने इसे पर्यावरण और मिट्टी के लिए उपयोगी पारंपरिक व्यवस्था बताया. उन्होंने कहा कि यह बारह तरह के बीज या अनाज एक साथ लगाने की पुरानी परंपरा है, जो समय के साथ नई पीढ़ी तक पूरी तरह नहीं पहुंच पाई.
उन्होंने टिहरी के जड़धार गांव का उदाहरण देते हुए बताया कि देवी और विजय ने इस परंपरा को छोटे स्तर पर फिर शुरू किया और एक छोटे भू-भाग में 12 तरह के बीज लगाए. इस खेती व्यवस्था का फायदा यह है कि अलग-अलग फसलों की पानी की जरूरत अलग होती है. ज्यादा बारिश होने पर अधिक पानी सहने वाली फसल बच सकती है, जबकि पानी की कमी होने पर कम पानी में होने वाली फसल काम आ सकती है.
उन्होंने बताया कि कुछ ऐसी फसलें भी होती हैं जो जमीन के नीचे विकसित होती हैं और मिट्टी की गुणवत्ता बनाए रखने में मदद करती हैं. इस पारंपरिक व्यवस्था में मिट्टी और पर्यावरण को समझने की सोच पहले से मौजूद थी. सम्मेलन में इस पारंपरिक मॉडल को सुनकर कई प्रतिनिधियों ने उनसे अलग से जानकारी ली और पूछा कि यह व्यवस्था कैसे काम करती है. आज विज्ञान भी ऐसे तरीकों के पर्यावरणीय महत्व पर चर्चा कर रहा है, जबकि उनके पूर्वजों ने बहुत पहले जमीन और पर्यावरण की जरूरतों को समझकर ऐसी परंपराएं विकसित की थीं. India का प्रतिनिधित्व करने और उत्तराखंड की इन परंपराओं एवं अनुभवों को अंतरराष्ट्रीय मंच पर रखने का अनुभव उनके लिए गौरव और संतोष का विषय रहा.
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पीएसके/वीसी