
New Delhi, 22 सितंबर . ‘करमा’ पर्व केवल एक धार्मिक अनुष्ठान नहीं बल्कि मनुष्य और प्रकृति के बीच सदियों पुरानी अटूट मित्रता, कृषि संस्कृति और भाई-बहन के पवित्र रिश्ते का जीवंत उत्सव है. मुंडा, उरांव, संथाल और गोंड सहित तमाम जनजातीय तथा सदान समुदायों के जीवन में रचा-बसा यह पर्व सिखाता है कि जब हम प्रकृति का सम्मान करते हैं, तो जीवन स्वयं एक सुंदर उत्सव बन जाता है.
करम पर्व के केंद्र में है ‘करम’ (वानस्पतिक नाम: नौक्लिया पार्विफोलिया / एडीना कोर्डिफोलिया) का वृक्ष. लोक-मान्यता है कि करम की लकड़ी इतनी मजबूत और औषधीय गुणों से युक्त होती है कि उसमें कभी घुन या कीड़े नहीं लगते. यही गुण मानव जीवन में भी शक्ति, दीर्घायु और अटूट स्वास्थ्य की प्रेरणा बनता है.
करम देवता को पराक्रम और ऊर्जा का अधिष्ठाता माना जाता है. खेतों में हरी-भरी फसलें, अनुकूल बारिश और अच्छी पैदावार की कामना के साथ गांव-समाज करम देव के सम्मुख नतमस्तक होता है.
रक्षाबंधन और भैया दूज की तरह ही करमा पर्व भी भाई-बहन के निष्कपट प्रेम का अद्भुत उदाहरण प्रस्तुत करता है. इस दिन बहनें निर्जला व्रत रखकर अपने भाइयों के सुखी जीवन, दीर्घायु और समृद्धि के लिए मंगलकामना करती हैं.
कहा जाता है कि जब भाई वनों या दूर-दराज के क्षेत्रों में श्रम के लिए निकलते हैं, तो बहनों की यह प्रार्थना उनके चारों ओर सुरक्षा-कवच बनकर चलती है. अगली सुबह विसर्जन के समय जब भाई अपनी बहनों को नदियां पार कराते हैं और बहनें उन्हें प्रेमपूर्वक ‘ठेकुआ’ तथा पारंपरिक पकवानों का प्रसाद देती हैं.
करम पर्व के साथ ही अविवाहित कन्याएं ‘जावा’ उत्सव मनाती हैं. बांस की छोटी-छोटी सुंदर टोकरियों में बालू भरकर उसमें सात प्रकार के अन्न (जैसे धान, मक्का, चना, उड़द आदि) बोए जाते हैं. कन्याएं दिन-रात इनकी देखरेख करती हैं, हल्दी के पानी से सींचती हैं और पारंपरिक जावा गीतों के जरिए इन्हें जगाती हैं.
अंकुरित होकर जब ये बीज हल्के पीले-सुनहरे रेशों में बदलते हैं, तो यह नई फसल के अच्छे अंकुरण, घर-आंगन में समृद्धि और आने वाले सुखी वैवाहिक जीवन का प्रतीक बनते हैं. पूजा के दौरान खीरे को संतान के प्रतीक स्वरूप अर्पित कर नव-सृजन की प्रार्थना की जाती है.
इस पर्व में करम पेड़ की डाली लाने का नियम अत्यंत मर्यादित और अनुशासित होता है. नए वस्त्रों में सजे युवक-युवतियां, पूजा की थाल में धूप, अक्षत, सिंदूर, फूल और दूध लेकर मांदर की गूंज के साथ वन की ओर प्रस्थान करते हैं.
वृक्ष की विधिपूर्वक वंदना के बाद एक या तीन डालियां काटी जाती हैं. सबसे अहम नियम यह है कि कटी हुई करम डाली किसी भी सूरत में जमीन को न छुए. इसे हाथों-हाथ या थाली के सहारे बड़े आदर के साथ गांव लाया जाता है. गांव के मध्य स्थित ‘अखाड़ा’ या आंगन को गाय के गोबर और मिट्टी से लीपकर पवित्र किया जाता है, जहां पाहन (पुजारी) द्वारा यह डाली विधिपूर्वक रोपी जाती है.
डाली रोपने के बाद व्रती महिलाएं और ग्रामीण चारों ओर वृत्त बनाकर बैठते हैं. पाहन द्वारा ‘करमा और धरमा’ नामक दो भाइयों की अमर लोककथा सुनाई जाती है, जो कर्म (सत्कर्म) और धर्म (प्राकृतिक संतुलन) की महत्ता को रेखांकित करती है. कथा समाप्त होते ही एक-दूसरे के कानों में जावा फूल खोंसकर शुभकामनाएं दी जाती हैं.
इसके बाद गीतों और सामूहिक नृत्यों का सिलसिला शुरू होता है. जिसमें युवतियां मांदर की थाप पर झूमती हैं. इसके अगले दिन प्रातःकाल अश्रुपूरित नेत्रों और नए संकल्पों के साथ करम डाली को किसी पवित्र नदी या जलस्रोत में विसर्जित कर दिया जाता है.
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वीकेयू/पीएम