
New Delhi, 14 अक्टूबर . ‘India रत्न’ से सम्मानित एपीजे अब्दुल कलाम को सिर्फ India नहीं बल्कि पूरी दुनिया एक महान वैज्ञानिक के तौर पर जानती है. इसमें कोई दोराय नहीं कि ‘मिसाइल मैन’ कहलाए अब्दुल कमाल के नेतृत्व में ही India एक परमाणु हथियार संपन्न देश बन पाया. हालांकि अब्दुल कमाल की भविष्य को देखने वाली उस ‘वैज्ञानिक’ सोच का जिक्र बहुत सीमित होता है, जब देश के President रहते हुए उन्होंने अपने फैसलों से Governmentों को भी हैरानी में डाल दिया था.
15 अक्टूबर 1931 को तमिलनाडु के रामेश्वरम में जन्मे एपीजे अब्दुल कलाम 25 जुलाई 2002 को India के 11वें President बने. वे ऐसे President थे, जिनकी कोई Political या कानूनी पृष्ठभूमि नहीं थी लेकिन उनके फैसले राष्ट्रहित में रहे. कलाम ने संवैधानिक प्रमुख के तौर पर, न सिर्फ राजनीति में काम करने का नया नजरिया पेश किया बल्कि यह भी साबित कर दिया कि उनका गैर-Political और गैर-कानूनी बैकग्राउंड असल में President भवन की पुरानी परंपराओं को तोड़ने में मददगार साबित हो सकता है. उन्होंने यह साबित कर दिया था कि वे महज ‘रबर स्टैम्प’ जैसे संवैधानिक प्रमुख नहीं हैं.
उसी सोच को दर्शाता किस्सा यह है कि अनुच्छेद 111 का इस्तेमाल हुआ, जब उन्होंने ‘ऑफिस ऑफ प्रॉफिट बिल’ को दोबारा विचार के लिए संसद को लौटा दिया था. संविधान का अनुच्छेद 111, संसद की ओर से पारित विधेयकों पर President की सहमति से संबंधित होता है. यह President के तौर एपीजे अब्दुल कलाम की ओर से 30 मई को इसके महत्व को समझने तक एक सामान्य प्रावधान बना रहा.
2006 में अलग-अलग पार्टियों के 43 सदस्यों को संसद से अयोग्य ठहराए जाने का डर था और राज्य विधानसभाओं के 200 अन्य सदस्यों पर भी यही खतरा मंडरा रहा था, इसलिए कानून मंत्री रहे एचआर भारद्वाज पर जल्दबाजी में बिल का मसौदा तैयार करने का सभी पार्टियों की ओर से दबाव था.
President को दी गई कई याचिकाओं के जरिए सत्ताधारी वर्ग के प्रभावशाली प्रतिनिधियों, जिनमें वाम मोर्चा के 11 सांसद भी शामिल थे, की विधायी सदस्यता को चुनौती दी गई थी. कलाम ने संविधान के अनुच्छेद 103(2) के तहत इन मामलों को चुनाव आयोग को भेजने में काफी दिलचस्पी दिखाई थी. कई लेखों में इसका जिक्र मिलता है.
भारद्वाज ने ‘अयोग्यता निवारण अधिनियम 1959’ में संशोधन किया और बदले हुए बिल को संसद के पिछले सत्र में पास कर दिया गया. 25 मई को कलाम को यह बिल मिला लेकिन संवैधानिक विशेषज्ञों से चर्चा करने के बाद उन्होंने अपनी मंजूरी देने से इनकार कर दिया था. यह President की ओर से शक्ति के स्वतंत्र प्रयोग की संवैधानिक मान्यता का एक दुर्लभ उदाहरण था.
यह भी सब जानते हैं कि एपीजे अब्दुल कमाल और पूर्व Prime Minister अटल बिहारी वाजपेयी के बीच रिश्ता बेहद गहरा था. हालांकि, वाजपेयी Government और एपीजे अब्दुल कलाम के बीच कुछ ऐसे प्रमुख ऐतिहासिक प्रसंग रहे, जब कलाम ने वाजपेयी के प्रस्ताव या सिफारिश को तुरंत स्वीकार नहीं किया था.
पूर्व Prime Minister अटल बिहारी वाजपेयी 1998 में एनडीए Government में एपीजे अब्दुल कलाम को मंत्री बनाना चाहते थे लेकिन कलाम ने यह प्रस्ताव ठुकरा दिया था. इसके चार साल बाद 2002 में वे President बने. पूर्व President ने किताब ‘टर्निंग पॉइंट्स: ए जर्नी थ्रू चैलेंजेज’ में इसका जिक्र किया था.
एक और किस्सा यह था कि फरवरी 2004 में Lok Sabha का कार्यकाल पूरा होने से छह महीने पहले उसे भंग करने की तत्कालीन Prime Minister अटल बिहारी वाजपेयी की सिफारिश को स्वीकार करना. बहुत कम लोग जानते थे कि कलाम ने उस सिफारिश को तुरंत स्वीकार नहीं किया था.
कुछ लेखों में जिक्र मिलता है कि एपीजे अब्दुल कलाम ने सिफारिश पर गहराई से सोचा, तत्कालीन अटॉर्नी-जनरल सोली सोराबजी से सलाह ली और फैसला लेने से पहले उन सभी दस्तावेजों को देखा, जिनमें सोराबजी की ओर से उन्हें भेजे गए President की शक्तियों से जुड़े Supreme Court के फैसले भी शामिल थे. उनसे पहले किसी भी President ने इस जिम्मेदारी को उनसे अधिक गंभीरता से नहीं लिया था.
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डीसीएच/पीएम