‘अगर बहुमत खिलाफ था तो ये आयोग के फैसले थे ही नहीं’, ईसीआई के कार्यप्रणाली पर कपिल सिब्बल

New Delhi, 28 सितंबर . चुनाव आयोग को लेकर राज्यसभा सांसद और वकील कपिल सिब्बल ने गंभीर सवाल उठाए हैं. उन्होंने दो चुनाव आयुक्तों के बयान का हवाला देते हुए कहा कि पिछले दस महीनों से उनके बीच कोई चर्चा नहीं हुई. सिब्बल ने कहा कि यदि दोनों चुनाव आयुक्तों की सहमति या जानकारी के बिना फैसले लिए गए हैं, तो यह सवाल उठता है कि संबंधित निर्णय वास्तव में चुनाव आयोग के थे या केवल मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के.

कपिल सिब्बल ने से बातचीत में बताया कि दो चुनाव आयुक्तों ने कहा है कि पिछले दस महीने से उनके बीच कोई चर्चा नहीं हुई. उन्होंने समय-सीमा का उल्लेख करते हुए कहा कि इस दौरान कई चुनाव हुए और यदि दोनों चुनाव आयुक्तों को यह जानकारी ही नहीं थी कि कौन से फैसले लिए गए हैं, तो यह गंभीर सवाल है. इस संबंध में जारी प्रेस नोट का भी उल्लेख करते हुए उन्होंने कहा कि अब तक उसके सही या गलत होने को लेकर कोई खंडन सामने नहीं आया है.

इसी आधार पर सिब्बल ने सवाल उठाया कि जिन फैसलों को चुनाव आयोग के फैसले के तौर पर देखा गया, क्या वे वास्तव में आयोग के सामूहिक फैसले थे? ये फैसले मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के फैसले थे.

Governmentी कार्यालय में बैठक की प्रक्रिया और एजेंडे से जुड़े सवाल पर कपिल सिब्बल ने कहा कि अगर कोई एजेंडा ही नहीं होगा तो कार्यवाही कैसे होगी. उन्होंने सवाल किया कि यदि बिना एजेंडे के कार्यवाही हुई और उसकी मिनट्स भी नहीं होंगी, तो बाकी दो चुनाव आयुक्तों को यह कैसे पता चलेगा कि कौन से फैसले लिए गए हैं और वे उनका विरोध किस तरह दर्ज कराएंगे. दोनों चुनाव आयुक्तों की आपत्ति यही थी कि उनकी सलाह के बिना फैसले लिए जा रहे थे. यदि ऐसा हुआ है तो यह गंभीर विषय है और Supreme Court को भी इस पर संज्ञान लेना चाहिए.

चार राज्यों में फैसलों को रोलबैक किए जाने के सवाल पर कपिल सिब्बल ने कहा कि अंतिम फैसला Supreme Court को करना है. हालांकि, उन्होंने अपनी राय रखते हुए कहा कि यदि चुनाव आयोग में निर्णय बहुमत से लिए जाते हैं और बहुमत ही किसी फैसले के खिलाफ है, तो यह सवाल उठता है कि वह निर्णय चुनाव आयोग का निर्णय कैसे माना जा सकता है. उन्होंने कहा कि चुनाव आयोग या तो सर्वसम्मति से निर्णय करता है या बहुमत के आधार पर. यदि बहुमत किसी निर्णय के खिलाफ था, तो उस स्थिति में संबंधित फैसलों को चुनाव आयोग के फैसले के तौर पर नहीं देखा जाना चाहिए.

उन्होंने इस पूरे मामले में Supreme Court की भूमिका को महत्वपूर्ण बताते हुए कहा कि अब यह अदालत पर निर्भर करेगा कि वह इन फैसलों और उनकी प्रक्रिया को किस तरह देखती है.

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पीएसके

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