Saturday , 6 June 2020
वेद व्यास, आल्हा ऊदल, भगवान राम का मंदिर है यहां…!

वेद व्यास, आल्हा ऊदल, भगवान राम का मंदिर है यहां…!

नईम कुरेशी
भारत के मध्य क्षेत्र मध्य प्रदेश व उत्तर प्रदेश के ग्वालियर, सागर, झांसी, बांदा आदि संभागों के 15-16 जिलों में बुन्देलखण्ड के लोग रहते आ रहे हैं. यहां के लोग लगभग 2 करोड़ की संख्या में कहे जाते हैं. स्वाभिमान, विनम्रता, साधना और पुरातनता यहां के लोगों की पहचान है. कवि जुगल किशोर, तुलसी, ईसुरी, प्रवीणराय आदि यहां की खास पहचान बन चुके हैं.

बुन्देलखण्ड इलाका हमेशा से संत, साधकों, कलाकारों, देश प्रेमी वीरों, महावीरों की भूमि रही है. प्राणनाथ पन्ना से राम, रहीम सभी बुन्देलखण्ड की पहचान बन चुके हैं. पन्ना हीरों से लेकर छतरपुर के वीर राजा छत्रसाल व उनकी बेटी तक देश के लिए बड़े-बड़े युद्ध लड़ चुकी हैं. झांसी की रानी लक्ष्मीबाई उनके तोपची गुलाम गौस खाॅन व उनकी एक अन्य वीर सेनापति झलकारी बाई का नाम इतिहास में गौरव बन गया है. यहां की सांस्कृतिक विरासतें सारी दुनिया में देश को प्रतिष्ठा दिलाती आ रही है. यहां के मजूर दिल्ली से लेकर कोलकत्ता तक देखे जाते हैं.

बुन्देलखण्ड की परम्परायें काफी गौरवपूर्ण हैं. साहित्य, संस्कृति, पुरातन इतिहास के तमाम सुनहरे पन्ने यहां मौजूद हैं. इस इलाके के विकास में आजादी के बाद से लगातार उपेक्षा की गई है. शताब्दियों से इस तरफ कोई नुमाइन्दों व यहां के जमींदारों व छोटे-मोटे राजाओं ने खास ध्यान नहीं दिया. पीने के पानी का भी माकूल इंतजाम नहीं रह पाया है जो तालाब व कंुए सदियों पहले बनाये गये थे उनमें से आधे तो बद इंतजामी के चलते खत्म हो गये. राहुल गांधी ने 10-15 साल पहले केन्द्र सरकार (Government) से 5 हजार करोड़ का जो पैकेज दिलाया था वो भ्रष्टाचारों की भेंट चढ़ गया. वन व पी.एच.ई. मेहकमे वाले सियासी नेताओं के संरक्षण में पैसा चट कर गये. अब जांच पर जांचें भर चल रही हैं.

लोगों की अशिक्षा भोलेपन को यहां के सियासतदां ने लगातार ठगा है. विकास के नाम पर कोई उद्योग नहीं लगवाये गये. लोगों को 500 किलोमीटर तक रोजगार के लिये एन.सी.आर. व कोलकत्ता तक जाना पड़ता है. जालौन के कालपी में भगवान वेदव्यास की जन्मभूमि बताई जा रही है. वहीं राजा बीरबल भी यहां हुये थे. मामा माहिल का ये जिला सबसे ज्यादा पिछड़ा माना जाता है. इसी तरह झांसी संभाग के अन्य जिले भी पिछड़े हैं व सागर संभाग के टीकमगढ़, छतरपुर, पन्ना, दमोह का भी हाल विकास में काफी पीछे रहा है. यहां के नुमाइन्दे व नौकरशाह उद्योग लगवाने में पीछे रहे हैं. आल्हा ऊदल की ये मात्रभूमि बुन्देली मजूरों के दर्द से कराह रही है. यहां के अधिकांश तालों में मिट्टी भरी पड़ी है. उनके लिये स्वीकृत पैसा भ्रष्टाचारियों की जेबों में जा चुका है.

कहीं कोई सुनने वाला नहीं दिखाई देता. ”जल ही जीवन है“ सिर्फ दीवारों पर लिखा नारा भर है. ग्रीक दार्शनिक थैलोंज के अनुसार हर वस्तु जल से बनी है इसलिये जल बिन सब शून्य ही है. पानी प्रबन्धन में बुन्देलखण्ड पूरे देश में सबसे पीछे माना जा सकता है. यहां के तालाबों की अनेक प्रजातियों की मछलियां कोलकत्ता में आवाज लगाकर अभी बेची जाती हैं. यहां पन्ना जिले के हीरों को पाने के लिये दुनियाभर की विदेशी कंपनियां लाईनों में खड़ी हैं. सीसों व लोहे के पहाड़ बुन्देलखण्ड में मौजूद हैं. आंवले के लाखों पेड़ हर जिले में हैं फिर भी उद्योग नहीं लगवाये जा सके हैं. अभी भी भा.ज.पा. व कांग्रेस में सत्ता पूर्व राजाओं के पास ही है पर जनता के लिये अभी भी काम नहीं करना चाहते हैं. सिर्फ नारे वादे व प्रस्ताव देते हैं आम जनता को.

डाॅ. काशी प्रसाद त्रिपाठी के अनुसार बुन्देलखण्ड में अनेक जनपदों में तालाब व प्राचीन कुंए जरूर हैं उन पर कोई सरकार (Government) ध्यान नहीं दे पा रही है. पानी के लिये हाहाकार है. फिर भी झांसी, जालौन, टीकमगढ़, छतरपुर आदि के पर्यटन स्थलों को देखकर आप आनंदित हुए नहीं रह सकेंगे. खासकर ओरछा, खजुराहो, झांसी की रानी का किला व तोपें जरूर देखें. ओरछा में 120 स्मारकों की फेहरिश्तें हैं जो झांसी से मात्र 16 किलोमीटर की ही दूरी पर हैं. हाल ही में मेरी ”बुन्देली माटी“द पुस्तक इस पर विस्तार से पढ़ी जा सकती है.