Wednesday , 21 October 2020

रंगमंच से सिनेमा में खामोश! अदालत जारी है…


  • लेखकचन्दन कुमार जांगिड़

  • फ़िल्मखामोश! अदालत जारी है. (2017) (ड्रामासोशल सीरियस सटायर)

(नोटयदि आपने फ़िल्म अब तक नही देखी है तो सार तक ही पढ़कर वापस लौट जावे.)

  • समय1971 भारत

  • कास्ट लीला बेणारे (नंदिता दास), सुखात्मे (सौरभ शुक्ला), मिस्टर काशीकर (यूसुफ हुसैन), मिस्टर पोंक्षे (स्वानन्द किरकिरे), मिसेज़ काशीकर (प्रवीणा भागवत देशपांडे), कार्णिक (राजीव सिद्धार्थ), सामन्त (अभय महाजन),बालू रोकड़े (अजितेश गुप्ता)

क्रूरितेश मेनन (निर्देशक), विजय तेंदुलकर (लेखक), आदित्य बेडेकर (संगीत), जय जे पटेल (सिनेमेटोग्राफर), सुशांत अमीन व विष्णु दास (साउंड डिज़ाइन).

  • सिनेमाई रूपांतरणशांतता! कोर्ट चालू आहे एक मराठी नाटक है जो सन 1963 में मराठी व भारतीय रंगमंच के प्रसिद्ध पदम् भूषण पुरस्कृत लेखक विजय तेंदुलकर ने लिखा था. असल मे यह नाटक लेखक फ्रेडरिक ड्यूरेनमेट के उपन्यास डाई पैने पर आधारित है. यूं तो यह कहानी डाई पैने के नकली कोर्ट (मॉक ट्रायल) से प्रभावित लगती है किन्तु फिर भी यह अपने आप मे इससे बहुत अलग कहानी है. जबकि डाई पैने का हिंदी रूपांतरित नाटक अभियुक्तहै जो कि पढ़ने पर ख़ामोश! अदालत जारी है से अलग लगेगा.

यूं तो विजय तेन्दुलकर लिखित नाटक पर सन 1973 में मराठी फिल्म शान्तता! कोर्ट चालू आहे बन चुकी हूं जिसमे सुलभा देशपांडे, अमरीश पुरी व अमोल पालेकरजैसे अभिनेताओं ने अभिनय किया था व जिसका निर्देशन सत्यदेव दुबे ने किया था. पर 2017 की फ़िल्म उस फिल्म से अलग है, जिसमे आज के युग के हिसाब से कई बदलाव किए गए है.

  • सार नाटक मंडली का एक समूह एक गाँव में नाटक का मंचन करने के लिए पहुंचता है. जब समूह का एक कलाकार दामले नहीं पहुंच पाता तो एक स्थानीय व्यक्ति सामन्त को दामले से बला जाता है. सामन्त को नाटक समझाने के लिए एक सुधारित, झूंठे कोर्ट की रिहर्सलकी जाती है और मिस लीला बेणारे को आरोपी बनाया जाता है. अचानक, नाटक एक आरोपप्रत्यारोप के खेल से असलियत में बदल जाता है, जहां मिस लीला बेणारे के निजी जीवन के बारे में अलगअलग लोगो के द्वारा कई राज़ खुलते है.

  • फ़िल्म रिव्युभारतीय इतिहास में विजय तेंदुलकर एक जानामाना नाम है, जिन्हें सर्वश्रेष्ठ नाटक लेखकों में माना जाता है. विजय तेंदुलकर के नाटकों की खासियत है उनका सोशल सटायर. रंगमंच के हिसाब से विजय तेंदुलकर की लिखावट को रूप देना फिर भी आसान है पर उनकी मूल भावना की आत्मा को बनाए रखते हुए, उसका सिनेमाटाईज़ेशन करना टेढ़ी खीर है. निर्देशक, सिनेमेटोग्राफर, म्यूज़िक के लोगो ने मिलकर यह काम बखूबी निभाया है.

  • निर्देशन

निर्देशक रितेश मेनन ने खामोश की आत्मा को जीवित रखते हुए उसका सिनेमा रूपांतरण करने में रीयलिस्टिक फॉरमेट को एक उचित ऑप्शन माना. पूरी फ़िल्म रीयलिस्टिक फॉरमेट में चलती है जहां लाइटिंग का कहीं अलग से सिम्बोलिज़्म के लिए प्रयोग नही किया गया, फिर चाहे वह बेणारे या सुख़ात्मे के मोनोलॉग ही क्यों न हो. यही चीज़ इसे रंगमंच के नाटक से अलग और कमाल बनाती है. फ़िल्म में निर्देशक ने बहुत सधा हुआ कार्य किया जैसे कि

  • नाटक सोशल सटायर है और फ़िल्म अन्त में विजय तेंदुलकर के द्वारा लिखित एक कोट दिखाती है जिसमे लिखा है कि यदि मेरे नाटक आज भी प्रासंगिक नज़र आ रहे है तो स्तिथियाँ आज भी नही सुधरी है.नाटक की मूल भावना प्रासंगिक है पर उसके क्राफ्ट जिनमे सबसे प्रमुख है भाषा‘, वह रियलिस्टिक सिनेमा के हिसाब से प्रासंगिक नही लगती. इसलिए निर्देशक ने सर्वप्रथम इसकी भाषा पर काम करके बदलाव किए, जिनमे डायलॉग्स को छोटा और सटीक करना, 1970 के मॉडर्न शब्दो का इस्तेमाल किया गया, कई डायलॉग्स जोड़े गए जैसे कि पोंक्षे का पहली बार कटघरे में परेशान होकर कहना देखो कैसे घूर रही है और कई बार स्तिथि व कुछ डायलॉग्स देख कर लगता है कि शायद रीयलिस्टिक बनाने के लिए कुछ डायलॉग्स सेट पर ही इम्प्रोवाइस किए गए है.

फ़िल्म प्रमुखतः बेणारे के परिप्रेक्ष्य से चलती नज़र आती है इसलिए निर्देशक ने फ़िल्म की एक चाल बेणारे की मानसिक स्तिथि को बयां करते हुए चली. ताकि फ़िल्म में नाटक की मूल भावना या विजय तेंदुलकर ना खत्म हो जाए. शुरआत में बेणारे के स्क्रिप्ट के हिसाब से कुछ ऐसे डायलॉग्स जो कि अप्रत्यक्ष रूप से उसकी मानसिक स्तिथि बयां करते है कि कहीं कुछ गड़बड़ हैपर निर्देशक ने इन्हें और प्रभावशाली बनाने के लिए कुछ चीज़ें जोड़ दी. जैसे कि

  • बेणारे का स्कूल में घट रही घटनाओं का अप्रत्यक्ष विवरण के बाद खिड़की खोलकर चैन की सांस लेना उसकी मानसिक घुटन व झूंठे समाज से आज़ाद होने की चेष्टा को दिखाता है.

  • शुरुआती मोनोलॉग जिसमे बेणारे सभी सहकर्मियों का विवरण करती है वह स्टेज के ऊपर है जो कि शुरुआत में बेणारे के मज़बूत हालात बयां करता है जो कि अंत मे सबसे घिरी हुई व सबके मध्य में ज़मीन पर सर नीचे किए हारी हुई बेणारे तक लेकर चलता है.

  • ब्लॉकिंग के अनुसार भी ज़्यादातर दृश्यों में बेणारे को या तो केंद्रीय बिंदु या फिर सभी किरदारों से प्रथक करके दिखाया गया है. खासकर जब अदालत की शुरुआत होती है तब.

  • कटघरा रखने के दृश्य से निर्देशक अपनी सीढ़ी चढ़ता है व दर्शकों के दिमाग मे इस सिंबॉलिक दृश्य से खामोश! अदालत शुरू हो गई हैकह जाता है.

  • निर्देशक ने डायलॉग्स व कविताओं में बदलाव करते हुए भी नाटक के मराठीपन को ज़िंदा रखा.

  • बेणारे का सामन्त के प्रति आकर्षित होना पोंक्षे को किस तरह प्रभावित करता है और पोंक्षे व बेणारे के मध्य कुछ छिपे हुए राज़ दिखाने के लिए निर्देशक ने पोंक्षे व बेणारे को एक फ्रेम में दिखाया है. जो आने वाली स्तिथियों को पहले ही बयां कर देते है. दोनो को प्रमुखतः बेचारा सामन्त कितना सीधा हैव दामले की बात जब उठती है तब एक फ्रेम में दिखाया जाता है.

  • यदि रंगमंच की ताकत डायलॉग्स है तो सिनेमा की ताकत एक्सप्रेशन है, यह बात डायरेक्टर ने बखूबी दिखाई है. मिसेज़ काशीकर के लिए इस्तेमाल किए गए सामन्त के डायलाग यही है वो जिनके ये (बच्चे) नही हैपर मिसेज़ काशीकर का क्लोज़अप मात्र उनके अंदर के भाव बगैर डायलाग के व्यकत कर जाता है.

  • सिनेमेटोग्राफी व संगीत जय जे पटेल ने कैमरे से तो आदित्य बेडेकर ने म्यूज़िक में शानदार काम किया है. उनके रचे गए दृश्य रंगमंच से खामोश नाटक को पृथक कर सिनेमा की एक अलग विधा बनाते है और विजय तेंदुलकर की आंतरिक भावों को भी व्यक्त कर जाते है. संगीत को इस प्रकार से डिज़ाइन किया गया है कि वह दृश्यों पर हावी ना हो, ना ही संगीत में कोई तड़क भड़क है. संगीत में किस भी प्रकार की आवाज़ को नही लिया गया. तार के कम्पन्न करने जैसे इफेक्ट्स सीधे दिमाग पर किसी गड़बड़ का वर्णन करते है. जैसे कि

  • जब सुख़ात्मे वकील की ड्रेस पहन रहे होते है तो यह शॉट पोंक्षे के परिपेक्ष्य से ओवर द शोल्डर लिया जाता है. ताकि दिखाया जा सके कि कमरे में कोई भी एक दूसरे से ज़्यादा दूर नही है और इसकी मूल भावना अब भी नाटक ही है.

  • पोंक्षे का सर्वप्रथम कठघरे में आना हमे अपर शॉट के रूप में दिखाया जाता है जिससे एक समय पर डिक्शनरी भी दिखा दी जाती है और पोंक्षे की गवाही को बाकी सभी किरदारों की गवाही से अलग भी दर्शा दिया जाता है. कुछ क्षणों के लिए आए गंभीर संगीत द्वारा कुछ गड़बड़ का संकेत दे दिया जाता है.

  • रियलिज़्म को और धारदार बनाने के लिए सामन्त की गवाही में बयां होने वाली स्तिथियों को अलग से न दिखाकर बस रीयलिस्टिक संगीत का प्रयोग किया गया है. जैसे कि गेट खुलनेबन्द होने की आवाज़ और घण्टी बजने की आवाज़.

  • अंत मे बेणारे जब ज़मीन पर स्तब्ध बैठ जाती है तब सन्न हो जाने वाले संगीत का इस्तेमाल किया गया है जो बयां करता है कि बेणारे अब तक वापस नही लौटी है. बेणारे एकदम खो चुकी है.

  • बेणारे के अंतिम मोनोलॉग हाईएंगल क्लोज़ अप पर जबकि सुख़ात्मे के मोनोलॉग लोएंगल क्लोज़ अप पर लेने से विजय तेंदुलकर की मूल भावना को दर्शाया जाता है जिसके अनुसार बेणारे को दबा दिया गया है. शुरू में उभरा हुआ किरदार बेणारे अब एक शोषित व समाज मे जकड़ी हुई किरदार रह गई है जबकि सुख़ात्मे जैसे शोषक इस समाज मे अलग महत्व रखते है.

  • लाइटिंगचूंकि फ़िल्म रिअलिज़्म पर टिकी थी इसलिए उसमे किसी भी सिंबॉलिक सीन के लिए नॉनरियलिस्टिक दृश्य को दर्शाने वाली लाइट का प्रयोग नही किया गया. परन्तु कुछ जगहों पर सिम्बोलिज़्म को भी रीयलिस्टिक लाइट से ही वर्णित कर दिया गया जैसे कि

  • जब सामन्त कहता है बेणारे बाई भी कमाल करते हैतब पोंक्षे के डायलॉग बहुत सी बातों में बेटा बहुत सी बातों मेंके समय उसपर लाइट पड़ रही होती है, जो कि दृश्य में उसकी बात के महत्व को ज़ोर देती है.

  • फ़िल्म की शुरुआत दिन से होती है जिसमे सेट पूर्णतः उज्ज्वल होता है. उसी तरह से बेणारे का किरदार भी एक दम बेफिक्र और प्यारा होता है. अंत तक शाम हो जाती है, लाइट्स भी कम इंटेंसिटी की हो जाती है. बेणारे का करैक्टर भी इसी तरह शोषित व कमज़ोर हो जाता है. साथ ही कमज़ोर होती लाइट्स फ़िल्म की गहराई को भी बयां करती है.

  • अभिनयफ़िल्म में एक भी ऐसा कलाकार नही है जिसने कमज़ोर अभिनय किया हो. हर कलाकार अपने किरदार की कम से कम समय मे छाप छोड़ जाता है.

  • कास्टिंगसबसे खास बात फ़िल्म में उसकी कास्टिंग की है. हर व्यक्ति अपने किरदार में एक दम सटीक लगता है.

हालांकि इतना सब होने के बावजूद भी कुछ नाम मात्र चीज़े थी जो निर्देशक जाने अनजाने में भूल गए. जिसमे खामोश! नाटक के प्रमुख सिंबल तोते का सही प्रयोग है. किन्तु यह निर्देशक की अलग कृति है इसलिए हो सकता है उन्हें तोते का प्रयोग व्यर्थ लगा हो.

कुल मिलाकर खामोश! अदालत जारी है एक कमाल की फ़िल्म है.