Saturday , 28 November 2020

जल्द ही झींगुरों की चीं-चीं उनकी प्रजातियों का बन सकती है आई-कार्ड

नई दिल्ली (New Delhi) . झींगुरों की चीं—चीं जल्द ही उनकी प्रजातियों की विविधता पर नजर रखने के लिए इस्तेमाल किया जा सकता है. वैज्ञानिक एक ध्वनिक संकेत पुस्तकालय की स्थापना कर रहे हैं जो इन कीड़ों की विविधता को ट्रैक करने में मदद कर सकता है. मॉर्फोलॉजी-आधारित पारंपरिक वर्गीकरण ने प्रजातियों की विविधता को पहचानने और स्थापित करने के लिए एक लंबा रास्ता तय किया है.

लेकिन यह अक्सर क्रिप्टिक प्रजाति को परिसीमित करने में पर्याप्त नहीं है- दो का एक समूह या अधिक रूपात्मक रूप से अप्रभेद्य प्रजातियां (एक प्रजाति के तहत छिपी हुई) या एक ही प्रजाति का विशेष जो विविध रूपात्मक विशेषताओं को व्यक्त करते हैं. इसलिए, केवल रूपात्मक विशेषताओं के आधार पर पहचान करने से प्रजातियों की विविधता को कम करके आंका जाता है. इस चुनौती से पार पाने के लिए पंजाब (Punjab) विश्वविद्यालय में जूलॉजी विभाग में विज्ञान और प्रौद्योगिकी विभाग (डीएसटी) इंस्पायर संकाय फैलो डॉ. रंजना जैसवारा क्षेत्र में मिलने वाले झींगुरों के ध्वनिक-संकेत पुस्तकालय स्थापित करने के लिए काम कर रहे हैं जिसे प्रजाति विविधता अनुमान और निगरानी में गैर-आक्रामक उपकरण के रूप में इस्तेमाल किया जा सकता है.

पुस्तकालय डिजिटल तरीके का होगा और जिसका इस्तेमाल स्वचालित प्रजातियों की मान्यता और खोज के लिए मोबाइल फोन एप्लिकेशन के माध्यम से और साथ ही भारत से नई प्रजातियों के दस्तावेज के लिए इस्तेमाल किया जा सकता है. डीएसटी-इंस्पायर फैकल्टी के रूप में डॉ. जैसवारा के शोध में प्रचलित प्रजातियों की सीमाओं में एक एकीकृत फ्रेम में उन्नत साधनों का उपयोग करके क्रिप्टिक प्रजातियों की समस्या का समाधान किया है.