भारत की सर्वोच्च न्यायालय का आदेश हर पत्रकार संरक्षण का हकदार

 (लेखक- विजय कुमार जैन/ )
प्रजातंत्र में पत्रकारिता को चौथा स्तंभ माना है. वर्तमान में चौथे स्तंभ को अनेक चुनौतियों का सामना करना पड़ रहा है. निष्पक्ष एवं निर्भीक पत्रकारिता काँटों पर चलने जैसा कार्य हो गया है. एक और स्थिति निर्मित हुई है जो राजनेताओं एवं अधिकारियों का अपनी लेखनी से गुणगान करे वह सर्वश्रेष्ठ पत्रकार हो जाता है. जिसकी कलम आलोचनात्मक चल गई वह उनका दुश्मन बन जाता है. सत्य को निर्भीकता से उजागर करने बाले पत्रकार को प्रताड़ित किया जाता है. अनेक प्रकार से यातनाएं दी जाती है. यहाँ तक की पत्रकार की हत्या (Murder) तक कर दी जाती है.

जब से इलेक्ट्रॉनिक मीडिया (Media) ने देश में अपना साम्राज्य फैलाया है निष्पक्ष एवं निर्भीक पत्रकारों को अनेक गंभीर चुनौतियों का सामना करना पड़ रहा है. मीडिया (Media) पर गोदी मीडिया (Media) या बिकाऊ मीडिया (Media) जैसे घिनौने आरोप लग रहे हैं. हम यह नहीं कहते कि यह सब कुछ सत्ता पक्ष द्वारा कराया जा रहा है. मगर जिस तरह के आरोप लग रहे हैं उनसे स्पष्ट आभास हो रहा है,यह संदेश दिया जा रहा है हमारे पक्ष में चलो अन्यथा आपका चलना मुश्किल कर दिया जायेगा.

समाचार पत्रों के अनेक मालिक पूँजीपति या कार्पोरेट जगत से होते हैं, उनके मन अनुसार ही पत्रकार को चलना पड़ता है अन्यथा समाचार पत्र से बिना कारण बताये मनमाने तानाशाही तरीक़े से हटा दिया जाता है. सभी समाचार पत्र मालिकों का कार्य व्यवहार तानाशाही पूर्ण नहीं होता है. अनेक समाचार पत्र मालिक स्वतंत्र एवं निष्पक्ष पत्रकारिता को संरक्षण देते हैं. जब से प्रजातंत्र के चौथे स्तंभ पर इलेक्ट्रॉनिक मीडिया (Media) का प्रभुत्व बढ़ा है तभी से प्रिंट मीडिया (Media) को धकेलने का सुनियोजित प्रयास जारी है. वास्तविकता यह है जो समाचार दिन भर चैनल पर चलता है उसे हम देखते भी हैं. मगर आम पाठक का अटूट विश्वास सुबह चाय के साथ आने बाले दैनिक समाचार पत्र पर है.

एक दिन पहले दिन भर चैनल पर चले समाचार को पाठक जब तक समाचार पत्र में विस्तार से नहीं पढ़ लेता तब तक उसे विश्वास नहीं होता है.ऐसी अनेक घटनाएं है जिन पत्रकारों की आपसी दुर्भावना से हत्या (Murder) कर दी जाती है, अपराधियों के विरुद्ध प्रकरण तक दर्ज नहीं होता है. मृतक की विधवा व बच्चे दर दर की ठोकरें खाते हैं. हमारे मध्यप्रदेश (Madhya Pradesh) में 60 वर्ष से अधिक या जिनको पत्रकारिता के क्षेत्र में 25 वर्ष हो गये हैं उन्हें दस हजार रुपये मासिक सम्मान निधि दी जा रही है यह वरिष्ठ पत्रकारों का सम्मान है. सरकार का यह कदम सराहनीय है, किन्तु पत्रकार की मृत्यु के बाद उनकी विधवा पत्नी को किसी प्रकार की सहायता का प्रावधान नहीं है.

हाल ही में एक प्रकरण आया है जिसमें न्याय के लिये देश के ख्याति प्राप्त पत्रकार ने भारत की सर्वोच्च न्यायालय की शरण ली. वरिष्‍ठ पत्रकार विनोद दुआ के खिलाफ राजद्रोह का मामला सर्वोच्च न्यायालय ने रद्द कर दिया है. सर्वोच्च न्यायालय ने कहा कि वर्ष 1962 का आदेश हर पत्रकार को ऐसे आरोप से संरक्षण प्रदान करता है.गौरतलब है कि एक बीजेपी नेता की शिकायत के आधार पर विनोद दुआ पर दिल्‍ली दंगों पर केंद्रित उनके एक शो को लेकर हिमाचल प्रदेश (Himachal Pradesh)में राजद्रोह का आरोप लगाया गया था. एक एफआईआर (First Information Report) में उन पर फर्जी खबरें फैलाने, लोगों को भड़काने, मानहानिकारक सामग्री प्रकाशित करने जैसे आरोप लगाए गए थे.

वरिष्‍ठ पत्रकार दुआ ने इस एफआईआर (First Information Report) के खिलाफ सर्वोच्च न्यायालय की शरण ली थी. न्यायालय ने केस को रद्द कर दिया. हालांकि कोर्ट ने दुआ के इस आग्रह को खारिज कर दिया कि 10 साल का अनुभव रखने बाले किसी भी पत्रकार पर एफआईआर (First Information Report) तब तक दर्ज नहीं की जानी चाहिए जब तक कि हाईकोर्ट जज की अगुवाई में गठित पैनल इसे मंजूरी न दे दे.कोर्ट ने कहा कि यह विधायिका के अधिकार क्षेत्र पर अतिक्रमण की तरह होगा. सुप्रीम कोर्ट (Supreme court) ने महत्‍वपूर्ण रूप से एक फैसले का हवाला देते हुए कहा कि हर जर्नलिस्‍ट को ऐसे आरोपों से संरक्षण प्राप्‍त है. कोर्ट ने कहा, ‘हर जर्नलिस्‍ट, राजद्रोह पर केदारनाथ केस के फैसले के अंतर्गत संरक्षण का अधिकारी होगा.’1962 का सुप्रीम कोर्ट (Supreme court) का फैसला कहता है कि सरकार की ओर से किए गए उपायों को लेकर कड़े शब्‍दों में असहमति जताना राजद्रोह नहीं है.

गौरतलब है कि कोर्ट ने पिछले साल 20 जुलाई को मामले में किसी भी दंडात्मक कार्रवाई से दुआ को दी गई सुरक्षा को अगले आदेश तक बढ़ा दिया था. अदालत ने इससे पहले कहा था कि दुआ को मामले के संबंध में हिमाचल प्रदेश (Himachal Pradesh)पुलिस (Police) द्वारा पूछे गए किसी अन्य पूरक प्रश्न का उत्तर देने की आवश्यकता नहीं है.भाजपा नेता श्याम ने शिमला (Shimla) जिले के कुमारसैन थाने में पिछले साल राजद्रोह, सार्वजनिक उपद्रव मचाने, मानहानिकारक सामग्री छापने आदि के आरोप में भारतीय दंड संहिता की विभिन्न धाराओं के तहत दुआ के खिलाफ प्राथमिकी दर्ज कराई थी और पत्रकार को जांच में शामिल होने को कहा गया था.श्याम ने आरोप लगाया था कि दुआ ने अपने यूट्यूब कार्यक्रम में प्रधानमंत्री पर कुछ आरोप लगाए थे.

इस एक प्रकरण से हम अंदाज लगाने मजबूर हैं कि देश के चौथे स्तंभ का अस्तित्व खतरे में है. जो सत्य को उजागर करने साहस करता है तो उसकी कलम तोड़ने या कुचलने के सुनियोजित प्रयास हो रहे हैं. विचारणीय विन्दु यह है कि देश के जाने माने लोकप्रिय पत्रकार विनोद दुआ अपने ऊपर लगाये देशद्रोह के प्रकरण में न्याय की गुहार लेकर देश की सर्वोच्च न्यायालय पहुंच गये. उन्हें सर्वोच्च न्यायालय से न्याय मिल गया. उन पर देशद्रोह का प्रकरण चलाने बालों को मात खानी पड़ी, मगर देश के छोटे छोटे नगरों, जिला मुख्यालयों पर कार्यरत पत्रकारों पर इस तरह का प्रकरण चलाया जाता है तो क्या वे सर्वोच्च न्यायालय तक पहुंच पायेंगे?

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