कोरोना की दूसरी लहर में सामान्य मरीजों का हाल रहा बुरा !

 (लेखक-अशोक भाटिया / )
कोरोना की दूसरी लहर की वजह से पिछले दो महीनों के दौरान आवश्यक स्वास्थ्य सेवाएं बाधित हुईं, क्योंकि कोविड-19 (Covid-19) के मामलों की संख्या में तेजी से वृद्धि हुई, जिसके कारण स्वास्थ्य सेवाओं के बुनियादी ढांचे के समाप्त होने के साथ-साथ स्वास्थ्य सेवाओं को कोविड देखभाल की ओर मोड़ दिया गया. विशेषज्ञों के मुताबिक, अन्य प्रमुख कारणों में कोरोना के संक्रमण का डर, गलत सूचना और लॉकडाउन (Lockdown) के कारण आवाजाही पर प्रतिबंध शामिल रहा. कोविड-19 (Covid-19) महामारी (Epidemic) ने समुदाय से लेकर तृतीय स्तर तक स्वास्थ्य देखभाल के सभी स्तरों पर गैर-कोविड देखभाल को प्रभावित किया. कैंसर देखभाल, उच्च रक्तचाप और मधुमेह प्रबंधन जैसी पुरानी बीमारियों की देखभाल की सेवाएं कोविड देखभाल में बदलने के कारण सबसे अधिक प्रभावित हुईं. लोग महामारी (Epidemic) के कारण लगे प्रतिबंधों और भय के कारण स्वास्थ्य सेवा लेने में सक्षम नहीं थे.

पिछले महीने सुप्रीम कोर्ट (Supreme court) में एक याचिका दायर की गई थी, जिसमें दावा किया गया था कि दूसरी लहर में अधिकांश राज्य सरकारों ने प्रतिबंध और प्रोटोकॉल लगाए हैं, जिस कारण हृदय, गुर्दे, लीवर और फेफड़ों के रोगियों के नियमित उपचार और जांच से इनकार कर दिया गया है. याचिकाकर्ता ने कहा, “गैर-कोविड-19 (Covid-19) रोगियों को बहुत कठिनाइयों का सामना करना पड़ रहा है. सभी अस्पतालों में प्रमुख सर्जरी स्थगित कर दी गई है, क्योंकि डॉक्टर (doctor) कोविड-19 (Covid-19) रोगियों के इलाज में व्यस्त रहे. हृदय रोगियों या गर्भवती महिलाओं के लिए अस्पताल में प्रवेश बहुत मुश्किल रहा. अब जबकि कोरोना के नए मामले रोजाना घट रहे हैं. कई राज्यों में तो कोरोना की दूसरी लहर दम तोड़ती दिखाई दे रही है. कोरोना रोगियो का बोझ कम होते ही देश के कुछ अन्य सरकारी अस्पतालों में ओपीडी खोली जा रही है. है. अब लोग वहां जाकर डाक्टरों से परामर्श ले सकते हैं. लगभग दो माह से ओपीडी खुलने का इंतजार कर रहे लोगों को इससे राहत मिलेगी.

कोरोना महामारी (Epidemic) ने इंसानों को कई तरह का आइना दिखाया है. एक तरफ इंसानों की जिंदगियां बचाने की जंग लड़ी जा रही थी तो दूसरी तरफ आपदा में लूट-खसोट करने वाले लोग थे. दूसरी लहर में लाॅकडाउन के दौरान 73 प्रतिशत बुजुर्ग लोग दुर्व्यवहार का शिकार हुए. एक अध्ययन के अनुसार इनमें से 35 प्रतिशत वरिष्ठ नागरिकों को तो घरेलू हिंसा सहनी पड़ी. इनमें भी महिलाओं की संख्या अधिक है. पिछले वर्ष के मुकाबले घरेलू हिंसा के मामलों में दस साल का रिकार्ड टूटा है. इस बार घरेलू हिंसा की काफी अधिक शिकायतें आईं जो इस कालखंड की भयानक तस्वीर पेश कर रही हैं. संक्रमण का डर, कमाई की चिंता, महानगरों के छोटे दड़बेनुमा घरों में सिमटे लोगों की जिन्दगी ऐसी हो गई जिसकी कल्पना भी नहीं की जा सकती.

ऐसे में हालात के शिकार बीमारियों से जूझ रहे लोगों और उनके परिवारों में उत्पन्न तनाव एक बहुत बड़ी चुनौती बन गया. अब समाज में पारिवारिक मूल्य तो रहे नहीं. कभी संयुक्त परिवारों में बुजुर्गों और बीमार लोगों को साजिंदगी से सहेजा जाना था लेकिन आज अधिकांश लोग एकाकीपन से जूझ रहे हैं. कभी भावनाओं की साझेदारी से कई शिकवे-शिकायतें अपने आप दूर हो जाते थे लेकिन अब एकल परिवारों का चलन हो गया. महामारी (Epidemic) ने ऐसे परिवारों के सदस्यों के तनाव को बहुत ज्यादा गहरा कर दिया है. पिछले दो महीने अग्निपरीक्षा से गुजरे हैं. बीमारियों से जूझ रहे लोगों ने बहुत संयम के साथ अपने को सहेज कर रखा है. वैसे तो पूरे देश ने मौके की नजाकत को समझा और लाॅकडाउन और सोशल डिस्टेंसिंग के अनुशासन में पूरा सहयोग दिया. कोरोना (Corona virus) अभी गया नहीं है परन्तु इसका प्रकोप कम हुआ है. अब एक और अग्नि परीक्षा हमारे सामने आ खड़ी हुई है, वह है कोरोना के अलावा अन्य बीमारियों से जूझ रहे लोगों का उपचार बेहतर ढंग से हो. हो सकता है लाॅकडाउन के दौरान उनकी बीमारी और बढ़ गई है.

अब सरकारी अस्पतालों में ओपीडी व्यवस्था पर पूरा ध्यान देना होगा. समाज और परिवारों का दायित्व है कि ऐसे लोगों की तिमारदारी की जाए. कैंसर रोगियों का उपचार हो, किसी की किडनी ट्रांसप्लांट होनी है, वे जो सर्जरी का डेढ़-दो साल से इंतजार कर रहे हैं, उनकी सर्जरी हो, लोगों को डायलिसिस करना पड़ता है, उन्हें आसानी से आर्थिक रूप से कमजोर सामान्य मरीजों का भी उपचार हो. अमीर आदमी तो अपना इलाज निजी अस्पतालों में करवा सकते हैं लेकिन गरीबों का सहारा तो सरकारी अस्पताल ही हैं. इतनी बड़ी संख्या में लोगों के लिए उपचार उपलब्ध कराना अग्नि परीक्षा तो है ही समाज में अपेक्षित, अवसाद या एकाकीपन का शिकार लोगों के जीवन को सहज कैसे बनाया जाए, उनकी हताशा को आशा में कैसे बदला जाए यह भी समाज के लिए चुनौती है.

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