Friday , 14 May 2021

39वे अंतर्राष्ट्रीय स्मारक एवं पुरास्थल दिवस के अवसर पर राष्ट्रीय वेबिनार का आयोजन

उदयपुर (Udaipur). शांति पीठ के तत्वावधान में एक ऑंन -लाईन विस्तृत गोष्ठी का आयोजन रविवार (Sunday) को किया गया. जिसमें आस्ट्रेलिया, विएतनाम, इथोपिया के विद्वानों सहित हैदराबाद, दिल्ली, शिमला, अहमदाबाद (Ahmedabad), उड़ीसा और कल्याणपुर सहित विभिन्न क्षेत्रों में कार्यरत विद्वानों ने सहभागिता की. जिनमें इथोपिया के डॉ मुलुनेह फ्रोम्सा, विएतनाम से डॉ सूरज भगत, आस्ट्रेलिया से सुनील ठक्कर सहित वरिष्ठ चिंतक-प्रशासक मोहन कोठारी, डॉ विवेक भटनागर, डॉ एल. डी. पटेल, डॉ नागाराजु, आर. सी.भट्ट, डॉ आर बी कुमार, डॉ एम. एस. आशावत, डॉ जी एल मेनारिया, करण सिंह चूंडावत, श्यामसुंदर चौबीसा, अनन्त गणेश त्रिवेदी, डॉ कमल सिंह राठौड़, डॉ मनीषा शेखावत, मानसिंह राठौड़ तथा डॉ ललित पांडेय ने अपने विचार व्यक्त किए.

जिसमें सभी ने समग्र रूप से वैश्विक स्तर पर ऐसा सौहार्दपूर्ण वातावरण, बनाने पर बल दिया. जिसमें हर तरफ फैली बहुरंगी विरासत जो महलों, मंदिरों, मस्जिदों, गिरजाघरों, बौद्ध व जैन धार्मिक स्थलों, जरथुस्त्रों के पूजा स्थल आदि सहित नदियों पहाड़ों, फूल घाटियों बर्फीले मैदानों सहित विशाल रेगिस्तान के साथ अलग-अलग संस्कारों, रीतिरिवाजों, खानपान व वेशभूषा के संरक्षण संवर्धन पर बल दिया और सामूहिक रूप से यह भी घोषित किया कि मानव जाति का इतिहास संघर्ष नहीं परस्पर मेलमिलाप का इतिहास जिसको आज वैश्विक महामारी (Epidemic) के परिप्रेक्ष्य में अनुभव किया जा सकता है.

करण सिंह चूंडावत ने उद्बोधन मे कहा कि धरोहरों के सन्दर्भ में सामान्यत किलो, महलो,तालाबो,बावडियो का ही अध्ययन,अध्यापन प्रसार, प्रचार किया जाता है.जबकि हमे धरोहरों के अध्ययन के दायरे को बढाते हुए उस समय की धातु उत्खनन,धातु परिष्करण, विभिन्न रूपो मे ढलान,उपयोग(जावर की यत्र तत्र बिखरी भट्टीया)तात्कालीन अर्थ व्यवस्था कृषि, गौपालन के सरक्षण, स्थायित्व के लिए अकाल व आपदाओं से निपटने के लिए छोटे-छोटे तालाब बनाकर जल व मिट्टी के सरक्षण के काम को कर कम पानी/मात्र नमी के सहारे कम समय मे पकने वाले,पौष्टिक खाधयान फसलो को उपजाने की अन्न को लम्बे समय तक सुरक्षित रखने पकाने की जो कला व साधन थे उनके अवशेषों को संरक्षित कर अध्ययन कर मानव कल्याण के लिए प्रसारित प्रचारित किया जाय.

तो भारतीय विशाल किलो,महलो प्रस्तर के बने विशालकाय मन्दिरों के निर्माण के काल का भी अध्ययन कर काल निर्धारण किया जाय.क्योकि मेरेशेत्र जो प्राचीन अवशेषों से भरा पडा है व ईसा से पाँच हजार साल पहले से बसा भव्य धार्मिक नगर था.जहाँ शिवं और शक्ति (महिषासुर मरदिनी का) काअराधना स्थल था.बड़े राज्य की राजधानी था.यहा पर बड़ी संख्या में भव्य कलात्मक प्रस्तर प्रतिमा शिव,नंदी,गणेश, विष्णु एवं वाराह अवतार, महिषासुर मरदिनी की मिलती है तो उनके आसपास मात्र मिट्टी की ईटो की दिवारे व बिखरी ईटे ही मिलती है.इससे ऐसा लगता है कि उस समय विशाल एव प्रस्तर मन्दिर बनाने की परम्परा नहीं थी या शास्त्रोक्त नहीं था जबकि यहाँ यत्र तत्र पर्याप्त पत्थर मौजूद थे.व बाद एयारहवी शताब्दी मे घूलेव/केशरियाजी का मन्दिर बनाया गया.

श्यम सुंदर चौबिसा ने बतायाकि हमै अपने पूर्वजों से जो अनमोल विरासत मिली है वह अद्भुत,अविस्मरणीय, बैजोड तकनीकी की धरोहर है जिसे हमै किस प्रकार संजौये रखै ताकि आने वाली पीढी तक उसके इतिहास व गौरव को उनमें आत्मसात कर सके यही नही हम अपने सत्य इतिहास को भी प्रवाह कर सके,हमारी परम्परा,बौधिक,प्राणिक,आध्यात्मिक, योगिक,आयुर्वेद संस्कारों का भी संचरण प्रवाह करै ताकि शून्य की अवधारणा की भाती विश्व कुटुंब को जाज्वल्यमान भारत की सत्य निधी का संदेश दे सके इमारत भ्रमण की जगह उसके ईतिहास गौरव,तकनीक, व वर्तमान दशा पर फोकस करना होगा मजबूत इच्छा शक्ति व संकल्प इसे पूर्णता दैगा.

गोष्ठी में अध्यक्श मोहन कोठरी जी ने सांस्कृतिक विविधता की बात की तो संस्थापक अनन्त गणेश त्रिवेदी,गोविंद मेनारिया, त्रिप्ति परिता एवं ललित पांडेय ने उदयपुर (Udaipur) के समीपवर्ती महत्व के स्थलों कल्याणपुर, चावंड, खुम्माण रावल का देवल और जगत जैसे स्थलों के संरक्षण की महती आवश्यकता पर बल दिया.
गोष्ठी का संचालन करते हुए डॉ कमल सिंह राठौड़ ने राजस्थान (Rajasthan)और मेवाड़ की विशिष्टता और इसका मूलभूत आधार अरावली के विलुप्त होने पर गंभीर चिंता व्यक्त करते हुए इसके विनाश को रोके जाने को अपरिहार्य बताया.

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