Friday , 14 May 2021

संत एकनाथ विरचित मराठी भावार्थ रामायण में मन्दोदरी जन्मकथा प्रसंग

(लेखक/ -डॉ. नरेन्द्रकुमार मेहता)
एकनाथ महाराज विरचित मराठी भावार्थ रामायण के अनुसार रावण की माता कैकसी पाँच अनाज को पीसकर पंचमुखी शिवलिंग बनाती थी और उसकी नियमित पूजा-अर्चना करती थी. वह सोचती थी कि ऐसा करने से उसके पुत्र अक्षय होंगे. एक बार शिवरात्रि के दिन उसने शिवलिंग की षोड़षोपचार विधि से पूजा की और तीन पत्तियों वाले एक लक्ष बिल्वपत्र लिंग पर चढ़ाए. वह प्रत्येक बिल्व पत्र को चढ़ाते हुए शिव नाम स्मरण करती जा रही थी. पूजा के उपरान्त वह ध्यान लगा रही थी. तभी अचानक इन्द्र ने आकर वह शिवलिंग समुद्र में डाल दिया. किन्तु महान आश्चर्य यह हुआ कि वह लिंग खण्डित नहीं हुआ. इस प्रकार सागर में घटकेश्वर की स्थापना हो गई. आज भी भक्तगण घटकेश्वर शिवलिंग का पूजन करते हैं. जैसे ही ध्यान मग्न कैकसी ने जब नेत्र खोले तो आश्चर्य यह हुआ कि उसे वह शिवलिंग खण्डित दिखा. वह विलाप करने लगी कि इससे मेरी संतानों का नाश हो जाएगा. उसे लगा कि रावण का इतना बड़ा राज्य किस काम का कि मेरा शिवलिंग चोर ले गए. माता का विलाप सुनकर रावण आ गया. माता ने रावण से कहा कि समुद्र में गिरा यह शिवलिंग खण्डित हो गया है. शैवागम शास्त्रों में यह कथन है कि खण्डित शिवलिंग पूजन से अनर्थ हो जाएगा. रावण ने उसे छ: सूत्रों से निर्मित एक रत्नलिंग को पूजने का कहा. कैकसी ने कहा कि वह अन्य किसी शिवलिंग को हाथ नहीं लगाएगी. वह प्राण त्याग देगी. कैकसी ने कहा कि शैव मार्ग में कहा गया है कि दूसरे लिंग की पूजा करने से तो अपने प्राणों को न्यौछावर कर देना चाहिए.
(मराठी भावार्थ रामायण-सुन्दरकाण्ड अध्याय-6)
रावण माता से विनती कर शंकरजी के पास माता द्वारा पूजित शिवलिंग लेने गया. उसने माता से कहा कि भगवान विश्वनाथ को प्रसन्न कर वह शिवलिंग वापस ला देगा. तब माता ने रावण को बतलाया कि शिवजी के पास एक आत्मलिंग यदि वह मुझे प्राप्त हो जाए तो वह अपने आपको धन्य मानेगी. रावण शिवजी के पास पहुँचा और उन्हें साष्टांग नमन किया. बाणासुर तथा रावण दोनों शिवजी को अत्यधिक प्रिय थे. शिवजी सकाम भाव से आए हुए भक्तों पर ध्यान नहीं देते थे और निष्काम भाव से आए भक्तों के आगमन से प्रसन्न होते थे. रावण ने वहाँ पर पार्वती को देखा. उसके मन में विचार आया कि मैं शिवजी से पार्वती माँग लेता हूँ. रावण शिवजी के सामने दो पहर खड़ा रहा परन्तु उन्होंने कोई प्रतिसाद नहीं दिया. रावण ने देखा कि शंकरजी नंदी की झंकार और नाद में व्यस्त हैं.
रावण ने अपना मस्तक काटकर उसमें अपने शरीर की शिराएं लगाकर वीणा बनाई और उस वीणा को बजाना प्रारंभ किया. कर्णप्रिय मधुर वीणा सुनकर शंकरजी प्रसन्न हो गए और रावण से कुछ माँगने को कहा. रावण का कटा हुआ सिर देखकर आशुतोष शिवजी को उस पर दया आ गई. उन्होंने उसे वर देते हुए कहा कि तुम्हारे दशशीश और बीस भुजा होंगी और तुम तीनों लोकों में शूरवीर होंगे. शिवजी ने उससे वर माँगने को कहा तो उसने माता कैकसी के लिए आत्मलिंग और स्वयं के लिए लावण्यवती पार्वती को माँगा. माता पार्वती को पुत्र समान रावण गलत दृष्टि रखकर माँग रहा है. इस बात से शंकरजी क्रोधित हो गए. गुरु पत्नी माता के समान होती है यह सोचकर रावण को पार्वती तथा माता कैकसी को आत्मलिंग दे दिया. उन्होंने रावण को सचेत किया कि इस आत्मलिंग को तुम्हें पवित्रता के साथ रखना होगा. इसे जमीन पर नहीं रखना है. यदि भूलवश रख दिया तो अनिष्ट होगा.
रावण पार्वतीजी को तथा आत्मलिंग लेकर बड़ा प्रसन्न हुआ और लंका की ओर चल दिया. उमा रावण को देखकर चिंतित हो गई. उन्होंने आत्मरक्षा के लिए भगवान विष्णु को पुकारा कि आप किसी भी प्रकार से मेरी रक्षा करें. आपने अजामिल, गजेन्द्र आदि से अपने भक्तों की रक्षा की, उसी प्रकार मेरी रक्षा कीजिए. विष्णुजी माता समान उमा की रक्षा के लिए तत्काल आ गए. उन्होंने गणेशजी से कहा कि तुम गाय चराने वाले गोपाल का रूप धारण करो और कार्तिकेय से कहा कि तुम मेरे शिष्य बनों और मैं ऋषि का रूप धारण करता हूँ. इस प्रकार रूप धारण कर वे रावण के समीप आए. रावण ने उन्हें आत्मलिंग तथा पार्वती की बात बतला दी. कार्तिकेय ने रावण से कहा कि आत्मलिंग तो वास्तविक है परन्तु ये उमा पार्वती नहीं है. भला कोई अपनी पत्नी को अन्य किसी को दे सकता है. शिष्य के कहने पर रावण ने पार्वती की ओर देखा तो उसे अत्यधिक घिनौने स्वरूप वाली स्त्री दिखाई दी. विष्णुजी ने रावण को अपने कौशल से फँसा लिया था. विष्णु ने कहा कि शिवजी भोले नहीं हैं. उन्होंने तुम्हें अपनी पत्नी न देकर कोई कर्कशा स्त्री तुम्हें दे दी है. उन्होंने पार्वती को छुपा लिया है. उनके आसन के नीचे वह छुपी हुई है. रावण बड़ा क्रोधित हुआ. वह शिवजी के पास जाने को तत्पर हुआ. उसी समय विष्णुजी ने रमा की सहायता से मन्दोदरी की निर्मिति की. रमा ने केशर, चन्दन का उबटन विष्णुजी के उदर पर लगाया और उससे मन्दोदरी का निर्माण किया. विष्णुजी के मध्यांग से उसका जन्म होने के कारण वह मन्दोदरी कहलाई. वह लक्ष्मी के समान सुन्दर थीं. विष्णुजी ने बड़ी कुशलतापूर्वक शिवजी के आसन के नीचे उसको स्थापित कर दिया. शिवजी भी समझ गए कि रावण ने गुरु पत्नी की अभिलाषा की इसलिए इसे दुर्भाग्य का सामना करना पड़ रहा है. रावण शिवजी के पास पहुँचा और कहने लगा कि वृद्धावस्था में तुम्हें इतना लोभ हो गया कि उमा को तुमने अपने आसन के नीचे छुपा लिया है और मुझे कुलटा दुर्भाग्य स्वरूप दे दी है. रावण उमा के स्थान पर मन्दोदरी को लेकर चल दिया. जाते-जाते वह शिवजी को कह गया कि, ‘वृद्धावस्था में तुमने स्त्री लोभ किया है. अब मेरी प्रिया जगन्माता ही तुम्हें तारेगी. अब उसकी अभिलाषा मत करना.Ó
(मराठी भावार्थ रामायण-सुन्दरकाण्ड, अध्याय-6)
मन्दोदरी को कन्धे पर बैठाकर तथा हाथ में आत्मलिंग लेकर विष्णु के पास जाने के लिए रावण रवाना हुआ. विष्णु ने उसे छलने की धारणा बना ली थी. मार्ग में रावण को लघुशंका की तीव्र आवश्यकता प्रतीत हुई. वह इस कार्य से शीघ्रतिशीघ्र निवृत्त होना चाहता था. पर समस्या यह थी कि वह आत्मलिंग को भूमि पर रख नहीं सकता था. अचानक गायों की रखवाली करने वाला गणेश उसे दिखाई दिया. वह तिलक तथा जनेऊ धारण किए हुए था. रावण ने उससे विनती की कि वह आत्मलिंग को अपने हाथ में रख ले. गणेश ने कहा कि तुम अतिशीघ्र वापस आ जाना. मेरी गायें बिछुड़ जाएंगी और बछड़े दूध को तरसेंगे. गणेश ने शर्त रखी कि यदि तुमने देर कर दी तो मैं शिव लिंग नीचे भूमि पर रख दूँगा. रावण लघुशंका से परेशान था. उसका वेग थम ही नहीं रहा था. शुद्ध होकर जब वह वापस आया तो उसे आत्मलिंग जमीन पर रखा दिखलाई दिया. उसने बड़ी श्रद्धा के साथ उस लिंग को बीस भुजाओं की सम्पूर्ण शक्ति लगाकर उठाने का प्रयत्न किया, परन्तु वह असफल रहा. उसे गणेश दिखाई दिया तो वह क्रोधित होकर उस पर वार करने के लिए उद्यत हुआ. अब रावण जोर-जोर से फूट-फूट कर रोने लगा क्योंकि आत्मलिंग टस से मस नहीं हो रहा था. उसे डर था कि माता कैकसी को अब वह क्या बतलाएगा? सारा वृत्तान्त सुनने पर वह मुझ पर क्रोधित होंगी. शिवजी ने जब उसे लिंग दिया तब वह शिवसूत्र से बँधा था और इसकी दो मुद्राएँ थीं. तब रावण ने उसे उठाने का प्रयत्न किया तो इधर-उधर करने का प्रयत्न किया तो वह पाँच मुद्राओं वाला हो गया. जब उसके ऊपर का वस्त्र हटाया तो वह 1. मुण्डेश्वर हो गया. उस पर पवित्र मुद्रिका डालते ही वह 2. गुप्तेश्वर कहलाया. शिव सूत्र को क्रोधपूर्वक डालने से फिर 3. गणकेश्वर का निर्माण हुआ. इसे कोई भक्तगण 4. धनेश्वर कहते हैं. शिव सेज डालने पर वह 5. शेजेश्वर कहलाया. इस प्रकार इन पांच मुखी शंकरजी का निवास हुआ. लंका में मन्दोदरी हनुमानजी को सीता के समान प्रतीत हुई, इसका कारण यह है कि विष्णुजी ने ही अपने केशर चन्दन के उबटन से मन्दोदरी का निर्माण किया, जब विष्णुजी ने उसकी तरफ देखा तो वह लक्ष्मीजी के समान प्रतीत हुई. सीताजी तथा मन्दोदरी दोनों पतिव्रता थीं. दोनों अयोनिजा थीं. इसीलिए हनुमान जी को दोनों में साम्य दिखाई दिया. वे इसीलिए उसे सीताजी समझे. जब रावण और मन्दोदरी के वार्तालाप को हनुमान जी ने सुना तो उन्हें ज्ञात हुआ कि सीता तो अशोक वाटिका में है तो वे उनसे मिलने अशोक वाटिका की ओर रवाना हो गए.

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