Sunday , 29 November 2020

ओवैसी के टीएमसी के साथ मिलकर चुनाव लड़ने के प्रस्ताव से ममता पड़ी असमंजस में

नई दिल्ली (New Delhi) . पश्चिम बंगाल (West Bengal) की मुख्यमंत्री (Chief Minister) ममता बनर्जी के लिए एआईएमआईएम नेता असदुद्दीन ओवैसी ने साथ चुनाव लड़ने का प्रस्ताव दे दिया है जिसे स्वीकार करना और न करना दोनों की ममता की मुश्किलें बढ़ाएगा. यही कारण है कि ओवैसी के प्रस्ताव पर तृणमूल में चुप्पी है. ममता आगामी चुनाव के मद्देनजर भाजपा और वाम-कांग्रेस के मोर्चे से लड़ाई की रणनीति तैयार कर रही है ऐसे में अभी अभी पश्चिम बंगाल (West Bengal) से सटी बिहार (Bihar) विधानसभा की पांच सीटों पर जीत से उत्साहित ओवैसी ने तृणमूल के सामने पासा फेंका था. उन्होंने कहा था कि भाजपा को हराने के लिए वह ममता के साथ मिलकर चुनाव लड़ना चाहते हैं. यह इसलिए एक पासा कहा जा सकता है क्योंकि वहां किसी घोषणा से पहले ओवैसी अपने लिए आधार तैयार करना चाहते हैं.

ध्यान रहे कि 294 सीटों वाली पश्चिम बंगाल (West Bengal) विधानसभा मे चार दर्जन से कुछ ज्यादा सीटें ऐसी हैं जहां अल्पसंख्यक मुस्लिम वोटर प्रभावी है. वैसे तो ममता पर अल्पसंख्यक राजनीति करने का आरोप ही चस्पा रहा है, लेकिन भाजपा के बढ़ते राजनीतिक दबाव के कारण पिछले कुछ वर्षों में वह साफ्ट हिंदुत्व की ओर बढ़ी हैं. जबकि ओवैसी हार्ड लाइन रखने वाले अल्पसंख्यक नेता हैं. बिहार (Bihar) में उनकी जीत का एक बड़ा कारण यही रहा. यही कारण है कि बिहार (Bihar) में राजग के मुकाबले सिर्फ महागठबंधन के होने के बावजूद कुछ सीटों पर बड़ी संख्या में ओवैसी की पार्टी को वोट पड़े थे. ऐसी स्थिति में ममता के लिए परेशानी यह है कि वह कट्टर राजनीति करने वाले ओवैसी के साथ जाती हैं तो भाजपा को वार करने का और बड़ा मौका मिलेगा. अगर हाथ झिड़कती हैं तो ओवैसी को जमीन पर खुलकर खेलने का मौका मिलेगा.

यह भी ध्यान रहे कि ओवैसी की नजर मुख्यत: उत्तर बंगाल पर है और यही वह क्षेत्र है जहां लोकसभा (Lok Sabha) में भी भाजपा ने बहुत अच्छा प्रदर्शन किया था. बताया जाता है कि यही कारण है कि कुछ दिनों पहले तक परोक्ष रूप से ओवैसी को बाहरी और भ्रमित करने वाले नेता बताकर तंज करने वाली तृणमूल कांग्रेस में अभी चुप्पी है. वैसे भी एक दशक से पश्चिम बंगाल (West Bengal) पर एकछत्र राज कर रहीं ममता के लिए किसी भी दल के साथ हिस्सेदारी करना बहुत मुश्किल है. यह परेशानी और बढ़ेगी क्योंकि वाम-कांग्रेस का मोर्चा भी तैयार होगा जिसमें हर वर्ग के नेता है. जबकि खुद तृणमूल के कई दिग्गज साथ छोड़ चुके हैं और कई लाइन में खड़े हैं.