Friday , 16 April 2021

दान को दैनिक दिनचर्या का हिस्सा बनाएँ: मुनिश्री विमलसागर

बीना . खिमलासा बड़े जैन मंदिर में विराजमान मुनि विमलसागर जी महाराज ने अष्ट दिवसीय 24 समवशरण विधान के शुभारंभ पर मंगलवार (Tuesday) को विशाल धर्म सभा को संबोधित करते हुए दान के महत्व को प्रतिपादित किया. उन्होंने बतया कि किसी भी अनुष्ठान के शुभारंभ पर जब इंद्र देव वर्षा करते हैं, तो वह अनुष्ठान सानंद संपन्न होता है. वैसे भी वर्तमान समय में किसानों के लिए यह वर्षा अमृत तुल्य है. दान में धन और जीवन की सार्थकता निहित है. दान का महत्व अपार है. दान शांति का कारण बनता है. दान से प्राप्त आनंद असीम होता है. दान को दैनिक जीवन का हिस्सा बनाया जाना चाहिये.

मुनि ने कहा कि शास्त्रों में चार प्रकार के दान का वर्णन मिलता है. इनमें आहार दान सर्वश्रेष्ठ होता है. इसके बाद औषधि दान, अभयदान और शास्त्रदान का स्थान आता है. दान के पीछे स्वकल्याण का भाव होना चाहिये. दान से पूर्व पात्र का चयन भी आवश्यक है. अपात्र को दिया गया दान कष्टों का कारण बनता है. उचित समय पर उचित व्यक्ति को दान देने से महान परिणाम हासिल होते हैं. जिस तरह एक छोटा सा बीज अनुकूल परिस्थितियाँ पाकर विशाल वटवृक्ष बन जाता है, उसी तरह एक छोटा सा दान भयंकर परिस्थितियों को टाल देता है.

मुनि ने कहा कि आहार दान के लिये मुनियों को उत्तम पात्र माना जाता है. इसक वाद ऐलक, क्षुल्लक, आर्यिकाओं, क्षुल्लिकाओं का नंबर आता है. आहारदान की अंतिम श्रेणी में किसी भी भूखे-प्यासे को तृप्त करना भी शामिल है. मुद्रा या मूल्यवान धातुओं के रूप में दिये गये दान के परिणाम सुखद नही होते. यदि इस तरह के दान से कोई व्यक्ति गलत कार्य करने लगता है तो उसके कुफल में दानकत्र्ता को भी भागीदान होना पड़ेगा.

मुनि ने कहा कि औषधि दान भी श्रेष्ठ है. आज के दौर में इस श्रेणी के दान को अधिक बढ़ावा देने की जरूरत है. शारीरिक और मानसिक बीमारियाँ लगातार बढ़ रही हैं. औषधि दान से इन्हें कम किया जा सकता है. अभयदान में कुछ खर्चा नहीं करना पड़ता. यह नैतिक रूप से भी आवश्यक है. जीवों के प्रति दया का भाव उनकी रक्षा करना, किसी को भी मानसिक या शारीरिक रूप से कष्ट न पहुँचाना, तथा अन्य जीवों के कष्टों का निवारण-अभयदान की श्रेणी में है. दान की मात्रा के मुकाबले भावना का अधिक महत्व है. यदि दान की मात्रा से ही दान के फल का निर्धारण होता तो दुनिया के धनिक संपूर्ण अनंत सुख को प्राप्त कर लेते. लेकिन ऐसा होता नहीं है अपनी शक्ति और सामथ्र्य के अनुरूप सभी को दान करना चाहिए.

मुनि ने कहा कि शास्त्र दान की अपनी महत्ता है. जिज्ञासु प्रवृत्ति के लोग भी इस दान को पाने के पात्र है. मूढ़ तथा संकीर्ण विचारों वाले व्यक्ति को शास्त्रदान नहीं देना चाहिये. वर्तमान में अन्य कई प्रकार के दान भी सामने आये हैं. इस प्रकार के दान से भी पुण्य प्राप्त होता है कि गरीब छात्रों को उनके पठन-पाठन से सहयोग किया जाये, बेसहारा व अशक्त लोगों के रहने-खाने-पहनने की व्यवस्था की जाये तथा संपूर्ण राष्ट्र के हित में किये जा रहे कार्यों में भागीदारी निभाई जाये. जो व्यक्ति अपने जीवन को सार्थक करना चाहते हैं, उसे बैंक (Bank) बैलेंस बढ़ाने की बजाय दान करने कराने की प्रवृत्ति को बढ़ाना चाहिये.

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