Friday , 27 November 2020

विचार मंथन / सीबीआई की हद

(लेखक-सिद्धार्थ शंकर / )
CBI बिना राज्य सरकार (State government) की इजाजत के किसी प्रदेश में जांच शुरू नहीं कर सकती. केंद्र सरकार (Central Government)(Central Government) भी बिना राज्य सरकार (State government) की अनुमति के जांच एजेंसी को इसके लिए मंजूरी नहीं दे सकती. सुप्रीम कोर्ट (Supreme court) ने उत्तर प्रदेश (Uttar Pradesh) में भ्रष्टाचार से जुड़े मामले में आरोपी अधिकारियों की याचिका पर यह फैसला सुनाया है. हाल में राजस्थान (Rajasthan), पश्चिम बंगाल, झारखंड, केरल (Kerala), महाराष्ट्र, छत्तीसगढ़, पंजाब (Punjab) और मिजोरम अपने यहां CBI को जांच की अनुमति देने से इनकार कर चुके हैं. इन राज्यों में विपक्षी दलों की सरकारें हैं. इस स्थिति में सुप्रीम कोर्ट (Supreme court) का यह फैसला अहम हो जाता है.

सुप्रीम कोर्ट (Supreme court) के जज ए.एम. खानविल्कर और बी.आर. गवई ने फैसला सुनाते वक्त दिल्ली स्पेशल पुलिस (Police) स्टेब्लिशमेंट (डीएसपीई) एक्ट का जिक्र किया. उन्होंने कहा कि धारा-5 केंद्र सरकार (Central Government)(Central Government) को केंद्र शासित प्रदेशों से परे CBI के सदस्यों की शक्तियों और अधिकार बढ़ाने की ताकत देती है. यह तब तक मंजूर नहीं है, जब तक कि कोई राज्य इस तरह के विस्तार के लिए अपनी सहमति नहीं देता है. राज्य डीएसपीईएक्ट की धारा-6 के तहत अपने क्षेत्र के भीतर इसके लिए सहमति देता है. जाहिर है यह प्रावधान संविधान के संघीय चरित्र के मुताबिक हैं. इसे संविधान के बुनियादी ढांचे में से एक माना गया है.

इसमें कोई संदेह नहीं कि CBI देश की सबसे प्रमुख जांच एजेंसी है. बड़े घोटालों की जांच कर उन्हें निष्कर्ष तक पहुंचाती रही है. आज भी नीरव मोदी, मेहुल चोकसी, विजय माल्या के आर्थिक घोटालों और राज्यों के विवादों की जांच CBI ही कर रही है. शीर्ष अदालत भी प्रमुख घपलों की जांच उसी को सौंपती रही है. एक किस्म से CBI न्याय की सूत्रधार है, लेकिन आज वह खुद भी कटघरे में खड़ी है. जब एजेंसी के निदेशक और विशेष निदेशक को ही सर्वोच्च न्यायालय ने क्लीन चिट नहीं दी, तो वह दूसरों को न्याय क्या दिलाएगी, सवाल बुनियादी यही है? इस सवाल पर सबसे पहले आंध्रप्रदेश (Andhra Pradesh) के पूर्व मुख्यमंत्री (Chief Minister) चंद्रबाबू नायडू की टिप्पणी आई थी कि CBI अब भरोसे के लायक नहीं रही. नतीजतन तब आंध्र ने सबसे पहले CBI पर अपनी सहमति वापस ली थी.

उसी तर्ज पर पश्चिम बंगाल (West Bengal) ने कार्रवाई की. हाल में राजस्थान (Rajasthan), झारखंड, केरल (Kerala), महाराष्ट्र, छत्तीसगढ़, पंजाब (Punjab) और मिजोरम अपने यहां CBI को जांच की अनुमति देने से इनकार कर चुके हैं. बेशक कुछ बड़े नेताओं के खिलाफ भ्रष्टाचार के मामलों में CBI जांच की घुड़कियां दी जाती रही हैं, ताकि वे नेता केंद्र सरकार (Central Government)(Central Government) की राजनीति के मुताबिक चलें, लेकिन आज भ्रष्टाचार के दाग खुद CBI पर ही हैं. दिल्ली स्पेशल पुलिस (Police) एस्टेब्लिशमेंट एक्ट के सेक्शन 2 के तहत CBI सिर्फ केंद्र शासित प्रदेशों में सेक्शन 3 के तहत अपराधों पर खुद से जांच शुरू कर सकती है. राज्यों में जांच शुरू करने से पहले CBI को सेक्शन 6 के तहत राज्य सरकार (State government) से इजाजत लेना जरूरी है.

CBI को चार तरह से केस दिया जा सकता है- केंद्र सरकार (Central Government)(Central Government) खुद CBI जांच का आदेश दे. हाईकोर्ट या सुप्रीम कोर्ट (Supreme court) CBI को जांच के आदेश दे तो. राज्य सरकार (State government) केंद्र सरकार (Central Government)(Central Government) से CBI जांच की सिफारिश करे. या फिर किसी केस को लेकर पब्लिक की डिमांड हो. इस केस को भी सरकार ही तय करती है. केंद्र सरकार (Central Government)(Central Government) के 2017 के आंकड़े के मुताबिक, लगभग 1200 केस अभी CBI में पेंडिंग हैं. जून 2014 से जून 2017 के बीच CBI को 791 केस मिले. यानी औसतन 263 केस हर साल मिले. इसमें 2014 में 207, 2015 में 326, 2016 में 151 और जनवरी से जून 2017 के बीच 107 केस CBI को दिए गए.