Tuesday , 15 June 2021

बदला लेने के लिए महिलाओं को ही बलात्कार का शिकार बनाना शर्मनाक हैं !

(लेखक- अशोक भाटिया / )
भारत में बनने वाली हर दूसरी या तीसरी फिल्म की एक ही कहानी होती है कि गाँव में जिस भी रसूकदार को किसी कमजोर से जब बदला लेना होता है वह उस घर की महिला पर बलात्कार कर अपना बदला चुकता करता है. फिल्मों का असर साधारण आम जीवन में भी आने लग गए है. उदहारण स्वरुप उत्तर प्रदेश (Uttar Pradesh) के बुलंदशहर (Bulandshahr) में पारिवारिक रंजिश का बदला लेने के लिए पहले एक परिवार के पुरुषों ने दूसरे परिवार की महिला के साथ गैंग रेप किया फिर इस गैंग रेप का बदला लेने के लिए पीड़ित महिला के पुरुष संबंधियों ने उक्त परिवार की महिला के साथ सामूहिक बलात्कार किया. राजस्थान (Rajasthan)के बारन जिले में पति के सामने एक महिला से 5 लोगों ने कथित तौर पर गैंगरेप (Gangrape) किया. मामला बीते दिनों का ही है जहां 30 वर्षीय महिला अपने पति और 8 साल की बहन के साथ बाइक पर घर लौट रही थी. मामले में दिलचस्प ये है कि जिसने रेप किया वो महिला के पूर्व पति का भी था. नक्सलवाद, जिसे भारत की आंतरिक सुरक्षा और शांति के लिए खतरा करार दिया जाता है, उससे निपटने के लिए भी सरकारी नुमाइंदे नक्सली और माओवादी महिलाओं से निपटने के लिए उनका बलात्कार करते हैं या चीरहरण कर उन्हें सरेआम घुमाते हैं. इतना ही नहीं नक्सली भी सरकारी नुमाइंदों को मजा चखाने के लिए उनसे संबंधित महिलाओं को ही अपना शिकार बनाते हैं.
यह भले ही हालिया चंद उदाहरण हों लेकिन प्राचीन काल में भी जब कोई आक्रमणकारी किसी राज्य पर अपना कब्जा कर लेता था तो वह उस राज्य को नीचा दिखाने के लिए सबसे पहले राज्य की महिलाओं पर ही धावा बोलता था. उसकी सेना घरों में घुसकर या फिर राह चलती महिलाओं को अगवाकर उनके साथ बलात्कार करती थी.
यह भी देखा गया है कि हमारी क्षेत्रीय गालियां भी स्त्री अंगों और उनसे कथित रूप से जोड़ ली गई नातेदारियों से ही संबद्ध रहती हैं. विभिन्न प्रकार के वाद-विवाद में जनसामान्य के बीच एक-दूसरे से नाता जोड़ने की भी बात सुनी जा सकती है. इतना ही नहीं पुरुष आधिपत्य वाले समाज में महिलाओं को “इज्जत” का प्रतीक मानकर उसी इज्जत को नेस्तनाबूद करने के लिए महिलाओं को ही प्रताड़ना, बलात्कार का शिकार बनाया जाता है.ऐसे हालातों में प्रश्न यह उठता है कि आखिर इज्जत का ठीकरा महिलाओं के सिर फोड़कर हम क्यों उन्हें पुरुषों का शिकार बनने देते हैं?
इस मुद्दे पर बुद्धिजीवियों का दो वर्ग अलग-अलग राय रखता है. बुद्धिजीवियों का एक वर्ग तो यह स्पष्ट कहता है कि सामाजिक मानसिकता के अनुसार महिलाओं को ही घर और परिवार की इज्जत कहा जाता है. इसीलिए जब किसी व्यक्ति को परिवार पर आघात करना होता है तो वह उसकी ‘इज्जत’ यानि महिला को ही अपना निशाना बनाता है. पारिवारिक कलह और रंजिश का बदला लेने के लिए महिलाओं के साथ ही यौन हिंसा की जाती है, क्योंकि महिला ही परिवार की कथित इज्जत है. इस वर्ग में शामिल लोगों का कहना है महिलाओं के प्रति हो रहे ऐसे अपराधों के लिए जिम्मेदार काफी हद तक उनके सिर मढ़ी गई इज्जत ही है.
वहीं बुद्धिजीवियों के दूसरे वर्ग में शामिल लोगों का स्पष्ट कहना है कि यद्यपि महिलाओं के प्रति हो रहे ऐसे अत्याचार बेहद दुखद हैं लेकिन इनका संबंध परिवार या समाज की इज्जत से ना होकर उनकी कमजोर शारीरिक अवस्था से है. पुरुष अपनी भड़ास निकालने के लिए महिलाओं को इसीलिए निशाना नहीं बनाते क्योंकि वे परिवार की इज्जत हैं बल्कि उन्हें इसीलिए निशाना बनाया जाता है क्योंकि वे शारीरिक रूप से कमजोर होती हैं और उन्हें आसानी से दबाया जा सकता है. पुरुषों द्वारा पुरुषों पर अत्याचार इसीलिए कम किया जाता है क्योंकि समान ताकत की बात हो जाती है. इसीलिए वे परिवार या समाज की महिलाओं पर ही अपना रोष निकालते हैं. वहीं ऐसा करने का दूसरा कारण यह भी है कि महिलाओं को निशाना बनाने से उनसे संबंधित पुरुष टूट जाते हैं, मानसिक रूप से कमजोर पड़ जाते हैं जो अपने आप में एक अचूक हथियार है. पुरुषों द्वारा महिलाओं को बस इसीलिए निशाना नहीं बनाया जाता क्योंकि वे उन्हें इज्जत मानते हैं बल्कि इसलिए बनाया जाता है क्योंकि वे परिवार की सबसे कमजोर हिस्सा होती हैं जिन पर वार करना आसान होता है.
इन चीजों के अलावा वर्तमान परिदृश्य में जैसी स्थिति महिलाओं की है वो अपने आप में दुर्भाग्यपूर्ण है. देश में जहां जहां भी रेप के मामले हुए हैं या फिर हो रहे हैं यदि उनपर नजर डाली जाए तो हमारे सामने कई महत्वपूर्ण तथ्य आते हैं जो ये बताते हैं कि स्थिति तब तक ठीक नहीं होगी जब तक इस समस्या के बारे में लोग सोचना खुद नहीं शुरू करते.कहीं महिलाओं का रेप बदले की भावना से हो रहा है. तो कहीं बालात्कार इसलिए हो रहे हैं क्यों कि लड़के ने जब लड़की को प्रपोज किया तो वो नहीं मानी. नवजातों से लेकर बुजुर्ग महिलाओं के बालात्कार तक कई मामले ऐसे आ चुके हैं जिसमें किया किसी और ने है और उसकी कीमत एक महिला को अपना बालात्कार कराकर चुकानी पड़ी.
जैसे हालात हैं वो दुखदाई इसलिए भी हैं कि महिला, महिला न होकर एक ऐसा माध्यम हो गई है जिसका इस्तेमाल सिर्फ और सिर्फ बदला लेने के लिए किया जा रहा है. बदले की नीयत से किसी महिला के साथ गलत काम करने वाले लोगों को लगता है कि महिला को हथियार बनाकर उन्होंने अपना उद्देश्य पूरा कर लिया है तो ऐसा बिल्कुल भी नहीं है. व्यक्ति सिर्फ और सिर्फ अपनी नीचता का परिचय दे रहा है.
2014 में भाजपा को सत्ता मिलने और नरेंद्र मोदी के प्रधानमंत्री बनने के बाद जो बात अब तक हमने सबसे ज्यादा सुनी वो महिलाओं से जुड़ी हुई थीं. प्रधानमंत्री ने न केवल बेटी पढ़ाने और बेटी बचाने की बातें कहीं बल्कि ये भी कहा कि देश विकास के पथ पर तभी चल सकता है जब महिलाओं को उचित सम्मान और बराबरी का दर्जा हासिल हो.भले ही अपने मंचों से इन बातों को बोलते हुए प्रधानमंत्री बहुत गंभीर रहे हों लेकिन जो देश में हो रहा है उसे देखते हुए ये कहना अतिश्योक्ति न होगा कि जनता के लिए महिलाओं को उचित मान सम्मान देने और बराबरी की ये बातें सिर्फ बातें हैं जिनको सुनकर किसी के भी कान पर का नजरिया है जूं शायद ही कभी रेंगती हो.

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