हिंद महासागर क्षेत्र में सामूहिक सुरक्षा और समृद्धि की दिशा में आईओएस सागर एक महत्वपूर्ण पहल : राजनाथ सिंह

करवार, 5 अप्रैल . भारत के रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने कर्नाटक के करवार में नौसेना कमांडरों के सम्मेलन में शामिल होने के लिए पहुंचे. इस अवसर पर उन्होंने भारतीय नौसेना के जहाज आईएनएस सागर को हिंद महासागर क्षेत्र में उसकी यात्रा के लिए रवाना किया. यह पहल भारत की ‘सागर’ पहल (सिक्योरिटी एंड ग्रोथ फोर ऑल इन द रीजन) के दस वर्षों की उपलब्धि के उपलक्ष्य में की गई है.

नौसेना कमांडर सम्मेलन दो चरणों में आयोजित किया जा रहा है. पहला चरण 5 अप्रैल को है. दूसरा चरण 7 अप्रैल को नई दिल्ली में है. भारतीय महासागर जहाज सागर पर 9 देशों के 44 नौसैनिक सवार होंगे. यह मिशन हिंद महासागर क्षेत्र के भविष्य को आकार देने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएगा. इससे भारत अपने समुद्री पड़ोसियों के साथ मजबूत रिश्ते बनाएगा और हिंद महासागर क्षेत्र में सुरक्षित और समावेशी माहौल बनाने में मदद करेगा.

रक्षा मंत्री ने भारतीय नौसेना के अधिकारियों, कर्मियों और मित्र देशों से आए प्रतिनिधियों का हार्दिक स्वागत करते हुए इस ऐतिहासिक यात्रा की शुरुआत पर बधाई दी. उन्होंने कहा कि यह मिशन उन सभी मित्र राष्ट्रों के सहयोग से संभव हुआ है, जो हिंद महासागर क्षेत्र की सुरक्षा और सहयोग को प्राथमिकता देते हैं.

रक्षा मंत्री ने इस बात पर विशेष गर्व व्यक्त किया कि यह मिशन राष्ट्रीय समुद्री दिवस (5 अप्रैल) के दिन आरंभ हो रहा है. उन्होंने याद दिलाया कि आज ही के दिन, वर्ष 1919 में, सिंधिया स्टीम नेविगेशन कंपनी लिमिटेड का भारत का पहला व्यापारी जहाज एस. एस. लॉयल्टी मुंबई से लंदन की ओर रवाना हुआ था. हम 1964 से इस दिन को राष्ट्रीय समुद्री दिवस के रूप में मनाते हैं.

उन्होंने कहा कि हिंद महासागर क्षेत्र (आईओआर) न केवल भारत की सुरक्षा के दृष्टिकोण से महत्वपूर्ण है, बल्कि यह व्यापार, अर्थव्यवस्था, पर्यटन और संस्कृति जैसे अनेक आयामों से भारत और अन्य तटीय देशों के राष्ट्रीय हितों से भी गहराई से जुड़ा हुआ है. रक्षा मंत्री ने इस क्षेत्र में सभी भागीदार देशों के साथ सहयोग को भारत की प्राथमिकता बताया और कहा कि भारत इस क्षेत्र को शांति और समृद्धि का क्षेत्र बनाना चाहता है.

राजनाथ सिंह ने यह भी स्पष्ट किया कि भारत की समुद्री उपस्थिति केवल अपनी सुरक्षा तक सीमित नहीं है, बल्कि इसका उद्देश्य यह भी सुनिश्चित करना है कि कोई भी राष्ट्र अपनी आर्थिक या सैन्य ताकत के बल पर अन्य देशों को प्रभावित न कर सके. भारत समान अधिकारों के सिद्धांत पर आधारित व्यवस्था का समर्थन करता है.

उन्होंने इस बात पर भी प्रकाश डाला कि आपदा की स्थिति में भारतीय नौसेना ने सदैव ‘प्रथम प्रतिक्रियाकर्ता’ के रूप में भूमिका निभाई है. हिंद महासागर में, चाहे वह समुद्री डाकुओं से रक्षा हो या जहाजों की सुरक्षा, नौसेना ने केवल भारतीय जहाजों ही नहीं, बल्कि मित्र देशों के जहाजों की भी सुरक्षा की है. उन्होंने कहा कि यह भारत की प्रतिबद्धता है कि हिंद महासागर क्षेत्र में मुक्त नौवहन, नियम आधारित व्यवस्था, एंटी पायरेसी, शांति और स्थायित्व सुनिश्चित किया जाए. हम हिंद महासागर क्षेत्र को भाईचारे और साझा हित के प्रतीक के रूप में विकसित करना चाहते हैं.

इस दौरान रक्षा मंत्री ने ‘महा-सागर’ नामक एक उन्नत पहल का भी उल्लेख किया, जिसे हाल ही में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने मॉरीशस की यात्रा के दौरान प्रस्तुत किया था. यह पहल मौजूदा सागर पहल को और अधिक सहयोगात्मक और समावेशी बनाएगी. अब जब भारत ने सागर को महासागर में तब्दील कर दिया है तो आईओएस सागर के लिए इससे उपयुक्त समय नहीं हो सकता है.

अपने संबोधन के अंत में उन्होंने संस्कृत के एक श्लोक का उल्लेख करते हुए सबके बीच सामंजस्य और सहयोग की भावना की कामना की:

“संगच्छध्वं संवदध्वं सं वो मनांसि जानताम्” (अर्थात – हम सभी एक साथ चलें, एक स्वर में बोलें, हम सब बुद्धिमान हों और हमारे मन एकजुट हों.)

रक्षा मंत्री ने विश्वास व्यक्त किया कि आईओएस सागर अपनी इस यात्रा के माध्यम से मैत्री, पारस्परिक विश्वास और सहयोग के आधार पर समुद्री उत्कृष्टता और सामूहिक सुरक्षा को सुदृढ़ करेगा.

एएस/