कांग्रेस के बिना खजुराहो का कैसा होगा चुनाव !

भोपाल 31 मार्च . मध्य प्रदेश की महत्वपूर्ण लोकसभा सीटों में से एक खजुराहो है. इस बार यहां भारतीय जनता पार्टी का मुकाबला कांग्रेस से नहीं, बल्कि समाजवादी पार्टी से है. यही कारण है कि एक सवाल उठ रहा है कि इस बार आखिर खजुराहो का चुनाव कैसा होगा.

खजुराहो वह संसदीय सीट है, जिसकी भौगोलिक स्थिति में लगातार बदलाव आया है . अब तक लोकसभा के कुल 14 चुनाव हुए हैं, इनमें पांच बार कांग्रेस को जीत मिली है, जबकि नौ बार भाजपा के उम्मीदवार जीते हैं. इस संसदीय क्षेत्र का कांग्रेस की ओर से प्रतिनिधित्व स्वतंत्रता संग्राम सेनानी राम सहाय तिवारी, कांग्रेस की दिग्गज नेता विद्यावती चतुर्वेदी और उनके पुत्र सत्यव्रत चतुर्वेदी कर चुके हैं.

वहीं वरिष्ठ समाजवादी नेता लक्ष्मी नारायण नायक, भाजपा की ओर से उमा भारती और विष्णु दत्त शर्मा ने भी प्रतिनिधित्व किया है. भाजपा ने आगामी चुनाव के लिए यहां से एक बार फिर शर्मा को उम्मीदवार बनाया है. बीते चार चुनाव में यह पहला अवसर है, जब भाजपा ने किसी व्यक्ति को दोबारा मैदान में उतारा हो.

शर्मा ने पिछला चुनाव लगभग पांच लाख वोटो के अंतर से जीता था. यह संसदीय क्षेत्र कांग्रेस और समाजवादी पार्टी के बीच हुए समझौते में सपा के खाते में गया है. सपा ने यहां से डॉ. मनोज यादव को मैदान में उतारा है, तो बहुजन समाज पार्टी ने कमलेश पटेल को.

खजुराहो संसदीय क्षेत्र तीन जिलों छतरपुर, पन्ना और कटनी में फैला हुआ है. यहां विधानसभा की आठ सीटें आती हैं और इन सभी सीटों पर भाजपा का कब्जा है. इस लोकसभा क्षेत्र में अब तक कांग्रेस ही भाजपा की प्रतिद्वंद्वी रही है, मगर इस बार समाजवादी पार्टी से भाजपा का मुकाबला है.

राष्ट्रीय स्तर पर भले ही कांग्रेस और सपा के बीच समझौता हुआ हो, मगर इससे कांग्रेस के स्थानीय कार्यकर्ता खुश नहीं हैं. ये कार्यकर्ता सपा के उम्मीदवार के लिए प्रचार करेंगे, यह अभी भी वे तय नहीं कर पा रहे हैं. इस संसदीय क्षेत्र के अंतर्गत आने वाली तीन विधानसभा सीटें राजनगर, पवई और बड़वारा ऐसी हैं, जहां कभी समाजवादी पार्टी से जुड़े लोग निर्वाचित हुए हैं.

राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि इस संसदीय क्षेत्र में वर्ष 2009 के लोकसभा चुनाव में कांग्रेस और भाजपा के बीच करीब का मुकाबला हुआ था और उससे पहले तो कांग्रेस के उम्मीदवार निर्वाचित भी हुए हैं. अब कांग्रेस ने यह सीट समाजवादी पार्टी को दे दी है, इसका असर आगामी चुनाव में साफ नजर आएगा. क्योंकि कांग्रेस के कार्यकर्ता और नेता सपा का प्रचार करने को दिली तौर पर तैयार नहीं हैं. इसका लाभ भाजपा को मिलना तय है.

एसएनपी/