Monday , 26 July 2021

झाबुआ ओर आलीराजपुर जिलो में लोक पर्व भगोरिया का आगाज

झाबुआ .आदिवासी प्रधान आलीराजपुर ओर झाबुआ जिलो के अंचलो में कल से परंपरागत भगोरिया पर्व की मस्तीभरी धूमधाम शुरू हो गई. इसके साथ ही होली तक लगने वाले सामान्य हॉट बाजार भगोरिया हॉट की संज्ञा पा जाएंगे. होली के सात दिन पहले से मनाये जाने वाले इस लोकपर्व का आगाज कल झाबुआ जिले के पेटलावद, मोहनकोट, कुंदनपुर, रजला ओर रंभापुर तथा आलीराजपुर जिले के आलीराजपुर सहित चंद्रशेखर आज़ाद नगर से हुआ जो होली तक इन जिलों मे विभिन्न स्थानो पर लगने वाले हाट के दौरान दिखाई देेेेगा.

भगोरिया या भोंगर्या कहे जाने वाले इस पर्व के अन्तर्गत पड़ने वाले हाट बाजार भगोरिया हाट कहे जाते हैं. इन हाट बाजारों में बड़ी रौनक रहती है. पुराने वक्त के दौर में युवा लड़के लड़की इन हाटबाजारों में अपने लिए जीवन साथी की तलाश किया करते थे, इस हेतु इसे प्रणय पर्व का भी नाम दिया जाता रहा है. ओर जीवन साथी मिलने और दोनों ओर से सहमति हो जाने की स्थिति में दोनों मेले या हाट से भाग जाते थे, सो इसे भगोरिया का नाम दिया गया. अब वह परम्पराएँ ओर वह स्वरूप बिल्कुल बदल चुका है ओर वैवाहिक संबंध भी नए दौर के हिसाब से ही निश्चित किये जाने लगे है, जिसमें आधुनिकता का समावेश हो चुका है और स्वाभाविक रूप से ऐसे में पुराने दौर के विवाह का स्वरूप मायने नही रखता. किन्तु फिर भी भगोरिया का नाम तो बचा ही है.

इस प्रकार होली के सात दिन पहले वाले सब हाट बाज़ारो को भगोरिया हाटबाजारो की संज्ञा दी जाती है. इन हाट को भगोरिया हाट क्यो कहा जाता है? इसके पीछे दो मान्यता है, पहली यह कि इसकी शुरुआत झाबुआ जिले के भगोर नामक गाँव से हुई थी, ओर दूसरी यह कि अपने ही समाज के युवक, युवती, जोकि एक दूसरे को पसंद करते है, इन हाटबाजारों से भाग खड़े होते थे, इसलिए भगोरिया. कहा जाने लगा. बाद में समाज के मुखिया लोग बातचीत कर कुछ शर्तों के साथ इस तरह भाग कर किये जाने वाले विवाह के लिए सहमति दे देते थे. किंतु क़भी कभी विवादास्पद स्थिति भी निर्मित हो जाया करती थी ओर मामला बड़े जद्दोजहद के बाद सुलझ पाता था. इस तरह झगड़ा सुलझाने की प्रक्रिया को “भांजगड़” कहा जाता है.

भगोरिया हाट से इस तरह भागने वाले इन युवक युवतियों का सहमति व्यक्त करने का अंदाज भी बड़ा रोचक हुआ करता था. कहा जाता है कि लड़की को पसन्द करने वाला लड़का उसके माथे पर गुलाल लगा दे और लड़की उसका दिया गया पान खा ले तो सहमति समझी जाती थी. आदिवासी समाज के विवाह योग्य युवक युवतियां इस दिन परंपरागत वस्राभूषण से सजधजकर इन हाट बाजारों में आया करते थे, ओर अपनी पसंद का इजहार कर जीवन मे साथ रहने की अभिलाषा व्यक्त करते थे. किन्तु अब न तो वह परंपरागत पहनावा ही रहा, ओर न ही इस तरह भागने की जरूरत ही होती है. पढ़े लिखे ओर नोकरीपेशा लड़के लड़किया अब काफी समझ बुझ वाले है, जिनका इस तरह के विवाह में न तो विश्वास दिखाई देता है, ओर न ही ऐसी कोई जरूरतही समझी जाती है.

समय के साथ साथ आदिवासी समाज भी विकास की दौड़ में पीछे नही रहा, ऐसे में इन हाट या मेले का अर्थ अब केवल घूमने फिरने ओर लुत्फ उठाने तक ही सीमित रह गया लगता है. अब तो आधुनिक वेशभूषा ही सब ओर दिखाई देती है. अब परंपरागत वस्त्र और गहने पहने हुुुई महिलाओं और पुरुषों को खोज पाना मुश्कील सा है. अब इन भगोरिया हाटबाजारों में उस पुरातन स्वरूप के दर्शन बमुश्किल ही हो पाते है. आधुनिकता के इस दौर में अब सब कुछ बदला बदला सा नजर आता है. समय के इस नए दौर में ये भगोरिया हाट या मेले केवल नाम के ही बचे है. ओर बदलते परिवेश में भगोरिया का बस केवल नाम ही शेष है.मीीडिया मे रस्म अदाायगी के तोर पर भले ही भगोरिया को महिमामंडित कर रस्म अदायगी की जाती रही है, ओर इन हाट या मेले का उसी पुरातन समय के दौर वाले स्वरूप का बखान किया जाकर चित्रण भी किया जाता रहा है किन्तु वास्तविकताएं इससे बिल्कुल अलग है.

वास्तविकता में यह हाट अपनी अस्मिता या परम्परागत स्वरूप खो चुके है. ओर बड़ी तेजी से येअब सामान्य हाट का रूप अख्तियार करते जा रहे है. यही नही बल्कि ये हाट अब शरारतों का निम्न स्वरूप भी ग्रहण करने लगे है. इन हाटबाजारों का स्वरूप विकृत करने में राजनीतिक दलों की भी बडी भूमिका रही है, जो अपनी स्वार्थ पूर्ति हेतु अपने अपने समर्थकों को साथ लेकर या तो पार्टी की विभाजन रेखा खीच देते है, या फिर राजनीतिक मन्तव्य साधने हेतु किसी बड़े नेता को लाकर भाषणबाजी शुरू कर पर्व की मस्ती में ख़लल पैदा कर देते है. बहरहाल भगोरिया का आगाज हो चुका है, ओर चूँकि, होली की मस्ती के वक्त इसका आगाज़ होता है, सो हर हप्ते लगने वाले हाट के मानिंद इन मे भी घूम आने में आखिर बुराई ही क्या है?

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