Sunday , 29 November 2020

RCEP को लेकर भारत के फैसले पर बंटे हैं एक्सपर्ट्स

नई दिल्ली (New Delhi) .भारतीय बाजार में चीन का दखल बढ़ने की आशंका और घरेलू दबाव के बीच आरसीईपी या आरसेप में शामिल होने का मसला भारत के लिए दुधारी तलवार बना हुआ है. विभाजित राजनीतिक राय के बीच जानकार भी भारत के फैसले को लेकर बंटे हुए हैं. स्वदेशी जागरण मंच जैसे संगठन इस फैसले को पूरी तरह राष्ट्रहित में बता रहे हैं. संगठन के सह संयोजक अश्वनी महाजन ने कहा कि भारत का फैसला राष्ट्रहित में है. लेकिन जापान जैसे उन देशों का फैसला अटपटा है जो ये कह रहे थे कि भारत के बिना वे इस समूह में शामिल नही होंगे.

उन्होंने कहा कि भारत की मैन्यूफैक्चरिंग, डेयरी और कृषि संबंधी चिंताओं के समाधान नही किया गया. भारत ने पिछले साल नवंबर में ही आरसेप में नहीं शामिल होने का फैसला किया था. तब से कोई बदलाव नहीं हुआ. बल्कि चीन को लेकर अंतरराष्ट्रीय समुदाय में आशंका बढ़ी है. उन्होंने कहा, मोदी सरकार ने राष्ट्रीय हितों की सुरक्षा की है. प्रधानमंत्री मोदी का यह निर्णय आत्मनिर्भर भारत, डेयरी, मैन्यूफैक्चरिंग, एग्रीकल्चर आदि इंडस्ट्रीज के हितों की रक्षा करेगा. उन्होंने कहा आत्मनिर्भर अभियान को बढ़ावा देना और भारत को बाजार बना देना दोनो एक साथ नहीं हो सकता.

पूर्व विदेश सचिव शशांक इसे घरेलू राजनीतिक मजबूरी का फैसला बताते हैं. उनका कहना है कि भारत ने देश के भीतर के उद्योगों और राजनीतिक दबाव के मद्देनजर ये फैसला किया है. हमारे देश की इंडस्ट्री सप्लाई चेन में कमजोर रही है. इसलिए चीन का दखल बढ़ने की संभावना जाहिर की जा रही थी. अब कोविड के बाद जिस तरह की स्थिति भारत मे चीन को लेकर बनी है. सीमा पर भी तनाव है ऐसे में चीन के प्रभुत्व वाले संगठन में शामिल होना भारत के लिए मुश्किल फैसला होता. लेकिन शशांक का कहना है कि भारत को संतुलन की कोशिश करना चाहिए. विकल्प खुला हुआ है. देखना होगा आगे क्या होता है. गौरतलब है पिछले साल प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी (Prime Minister Narendra Modi) ने आरसेप से बाहर होने का फैसला किया था.

विपक्ष और सरकार के समर्थक कुछ संगठन लगातार आरसीईपी आरसेप का विरोध तो कर रहे थे. लेकिन सरकार ने जब फैसला कर लिया तो विपक्ष के कुछ नेताओं का बयान आरसेप के पक्ष में नजर आने लगा. यह माना जा रहा था कि शर्तों में कुछ फेरबदल के साथ भारत मुक्त व्यापार के इस बहुपक्षीय समझौते में शामिल हो जाएगा. आरसीईपी या आरसेप 16 देशों का एक समूह है. इनमें आसियान (सिंगापुर, इंडोनेशिया, वियतनाम, मलेशिया, थाईलैंड समेत दस देश) देशों के साथ-साथ छह अन्य देश न्यूजीलैंड, चीन, भारत, जापान, आस्ट्रेलिया और दक्षिण कोरिया शामिल हैं. माना जा रहा था कि इस समझौते के अमल में आने के बाद ये 16 देश दुनिया का बेहद शक्तिशाली आर्थिक ब्लॉक बन जाएंगे. अगर भारत और चीन इस समझौते में एक साथ शामिल होते तो दुनिया की करीब आधी आबादी और 35 फीसद जीडीपी इसके हिस्से में आ जाती.