Friday , 7 May 2021

कोरोना की मार, श्रमिकों का पलायन, लाखों बेरोजगार

जबलपुर, 31 दिसंबर . डर और दहशत के साये में बीता वर्ष 2020 किसी बुरे सपने की तरह था जिसे शायद याद करते हुए भी शरीर में एक सिहरन सी उठे. प्रदेश में पहला 20 मार्च को कोरोना का पहला मरीज शहर में मिला. इस आभूषण व्यवसायी के बाद कुछ दिनों रुक कर कोरोना की चेन ऐसी बढ़ी विराम लॉकडाउन (Lockdown) भी नहीं लगा पाया. कोरोना ने जहाँ घोषित आंकड़ों के अनुसार ढ़ाई सौ अधिक लोगों को असमय काल का ग्रास बनाया वहीं इसने कईयों की जिंदगी तबाह कर दी. अच्छी खासी चल रहीं कंपनियों और कार्यों को लॉकडाउन (Lockdown) ने ऐसा डसा कि सभी के बंद होने से सड़कों पर आए लाखों श्रमिक जहाँ पलायन करने विवश हुए वहीं लाखों ने अपनी नौकरियां गवाँ दीं. कोरोना की त्रासदी में जहाँ छोटे से बड़े कारोबारियों को गहरी चोट पहुंचाई वहीं इसके डर और दहशत को कुछ निजी अस्पतालो ने आपदा में अवसर में बदल कर इस कदर लूट मचाई कि सेवा की दृष्टि से देखी जाने वाली चिकित्सा व्यवस्था भी शर्मसार हो गई. निजी हॉस्पिटल्स की लूट को प्रशासनिक चुप्पी ने भी मौन समर्थन दिया जो साल के अंतिम पड़ाव तक भी बदस्तूर जारी रही. जाते जाते यूके से आए कोरोना के नए स्ट्रेन के नाम पर यह साल शहर में एक और बीमार महिला को सामने लाकर और भी दहशत बढ़ा गया. हालांकि बीता साल परिचितों से दूरियों के साथ परिजनों से करीबियों के लिए भी याद किया जाएगा. हालांकि यह पहली बार ऐसे दुखद मंजर भी सामने आए जब कोरोना से असमय काल का ग्रास बनने वाले अपनों के शवों को अपने ही कांधा तक न दे पाए. इस साल ने हमें यह बताया कि जीने के लिए हमें कितनी चीजों की वास्तव में जरूरत है. इसे एक आध्यात्मिक वर्ष भी कहा जा सकता है जो बिना किसी सत्संग के जीवन का एक कभी न भूलने वाला सबक भी सिखा ही गया कि कौन अपना है कौन पराया.

कोरोना ने मचाया कोहराम………………

डर और दहशत के साये में वर्ष 2020 बीता है. यह सब हुआ कोरोना की वजह से जिसके कहर से भारत में कोहराम मचा. कहीं कोरोना न हो जाये लोग एक-दूसरे से दूर हो गए, मास्क, सेनेटराइज और सोशल डिस्टेंसिंग के साथ जीवन बचाने मजबूर होने लगे. हालांकि कोरोना के आने से जो मिला उसमें विलुप्त हो रही भारतीय संस्कृति और रीति रिवाज जिसे पुन: अपनाया जाने लगा जिससे लोगों में परिवर्तन हो रहा है. स्वास्थ्य रहने के लिए लोग अब पूर्वजों द्वारा अपना, गए तौर-तरीके और औषधियों का सेवन कर रहे है. घर पहुंचते ही कपड़े उतारकर झटकारना, तुरंत साबुन से हाथ धोना, नहाना और परिवार में भी सोशल डिस्टेंसिंग फॉलो करना जरूरी समझा जाने लगा है. करे कोई भरे कोई की कहावत चरितार्थ हुई भारत के साथ पूरे वर्ल्‍डमें कुछ इसी तरह का हुआ. चाइना से फैले कोरोना ने पूरे विश्व में कोहराम मचा दिया. लोग जान बचाने सेफ जगह तलाशने लगे. वैक्सीन कब आती की नहीं उपचार अभाव के चलते लाखों लोगों की जान चली गई. भारत की बात करे तो यहां भी आंकड़ा कम नहीं रहा. देखा जाए तो कईयों की मौत कोरोना की दहशत से हुई है और जिन्हें कोरोना हुआ भी तो वे उपचार अभाव के चलते मौत के मुंह में शमा गए. स्थिति अभी भी ठीक नहीं है वक्त के साथ समझौता करने से ही जीवन सुरक्षित होगा.

दवाई और डॉक्टरों (Doctors) की चली खूब दुकान………….

कोरोना क्या आया सरकार ने फुटपाथी डॉक्टर (doctor) और दवाई वालों को खुली छूट दे दी. अस्पतालों में खुली लूट मच गई. जान बचाने लोग कर्ज में दब गए. लेकिन जिन डॉक्टरों (Doctors) को भगवान माना जाता है उन्होंने मानवता और इंसानियत को तार-तार कर जितना लूटना था लोगों को लूटा. दिनभर क्लिनिक खोलकर बैठने वाले ऐसे डॉक्टर (doctor) जो सौ रुपए के लिए तरसते थे वे आज लखपति बन बैठे. दवा व्यापारियों ने भी जमकर दवाई, मास्क, सेनेटराइज के नाम लोगों को ठगा. इससे कई की जमा पूंजी खत्म हो गई अब भुखमरी की कगार पर है.. कईयों के रोजगार छीन गए. कंपनियां बंद हो गई. इंजीनियरिंग पास युवक सब्जी बेचने मजबूर हो गए.

पहले भी आईं महामारिया…………

कोरोना के संबंध में 93 साल के बुजुर्ग का कहना है कि जब अंगे्रज थे तब भी बीमारियां फैली लेकिन उन्होंने लोगों को संयम बरतने और घबराने की जरूरत नहीं है बल दिया. संक्रमण दिखाई नहीं देते लाखों हवा में फैले है कोरोना उनमें से एक है लेकिन जिस तरह से उसे लेकर भारत में भय का वातावरण बनाया गया यह दृश्य उन्होंने कभी नहीं देखा. उनके अनुसार यह सब जनसंख्या कम करने का प्रपोगंडा है. उनका कहना है कि कोरोना को नकार नहीं रहे लेकिन इससे फुटपाथ पर रह रहे किसी भिखारी और मजदूरों की मौत नहीं हुई. वहीं ईश्वर को प्यारे हुए जिनका समय था. बेमौत उनकी हुई जिन्हे उपचार नहीं मिला.

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