पाकिस्तान में गहराया आर्थिक संकट, इज्जत बचाने के लिए सरकारी कंपनियों की बिक्री

New Delhi, 15 जनवरी . Pakistan की Governmentी कंपनियों को Political दखल, खराब शासन और अव्यवस्था की वजह से भारी नुकसान का सामना करना पड़ रहा है. एक Pakistanी मीडिया रिपोर्ट में कहा गया है कि हालात ऐसे हैं कि Governmentी कंपनियां बहुत कम कीमतों पर प्रोडक्ट्स और सर्विस बेचने के लिए मजबूर हैं.

Pakistan के एक्सप्रेस ट्रिब्यून के अनुसार शासन में सुधार करने के बजाय, एक के बाद एक आने वाली Governmentें मुश्किल फैसले टालती रहती हैं. Governmentी कंपनियों को खराब परफॉर्मेंस, Political हस्तक्षेप और कमजोर उत्तरदायित्व के बावजूद नियमित तौर पर बनाए रखा जाता है. जब वे भारी नुकसान और बहुत ज्यादा कर्ज जमा कर लेती हैं, तभी अचानक निजीकरण को हल मान लिया जाता है.

यह पैटर्न सभी क्षेत्रों में एक जैसा दिखता है. व्यवसायिक मैनेजमेंट की जगह धीरे-धीरे Political नियुक्ति ले लेती है, और कमर्शियल अनुशासन खत्म हो जाता है. सालों की अनदेखी और पब्लिक फंड डालने के बाद ऐसी कंपनियों को बेचने से नुकसान सामाजिक हो जाता है और फायदे प्राइवेट हो जाते हैं.

Pakistan में निजीकरण शायद ही कभी कोई जानबूझकर या अच्छी तरह से प्लान किया गया इकोनॉमिक रिफॉर्म रहा हो. Pakistan इंटरनेशनल एयरलाइंस (पीआईए) इस नाकामी को साफ तौर पर दिखाता है. कभी एक जानी-मानी क्षेत्रीय एयरलाइन, पीआईए को ज्यादा स्टाफ, Political हस्तक्षेप और बिजनेस लॉजिक की कमी ने कमजोर कर दिया. एक के बाद एक Governmentों ने एयरलाइन को एक कमर्शियल एंटिटी के बजाय सिर्फ पैसे कमाने का जरिया माना.

इसे चालू रखने के लिए अरबों रुपए खर्च किए गए, जबकि सर्विस की क्वालिटी खराब होती गई और प्रतिस्पर्धा खत्म हो गई. पीआईए का निजीकरण किया जाना कोई रणनीतिक योजना नहीं थी. यह लंबे समय से चली आ रही गवर्नेंस की नाकामी को मानना ​​था.

प्राइवेटाइजेशन के सपोर्टर अक्सर टेलीकॉम कंपनी पीटीसीएल को इस बात का सबूत बताते हैं कि प्राइवेट ओनरशिप से परफॉर्मेंस बेहतर होती है. असल में, प्राइवेटाइजेशन के बाद पीटीसीएल ने ऑपरेशनल और तकनीकी सुधार किए. नेटवर्क मॉडर्नाइजेशन और सर्विस का विस्तार हुआ.

फिर भी यह उदाहरण Pakistan के प्राइवेटाइजेशन के तरीकों में गहरी कमियों को भी सामने लाता है. सालों बाद भी, हजारों पुराने Governmentी कर्मचारी और पेंशनर पेंशन, सर्विस रेगुलराइजेशन, और प्राइवेटाइजेशन के बाद के अधिकारों को लेकर चल रहे केस में फंसे हुए हैं.

ये अनसुलझे झगड़े बताते हैं कि कैसे इंसानी और कानूनी खर्चों को दूसरी चिंता माना गया. आर्टिकल में कहा गया है कि वे एक ऐसे प्रोसेस का खुलासा करते हैं जो इंस्टीट्यूशनल जिम्मेदारी को सुरक्षित रखने के बजाय लेनदेन को पूरा करने पर फोकस करता है.

प्राइवेटाइजेशन से कंज्यूमर्स को अपने आप कम कीमतों का फायदा मिलता है, यह सोच गुमराह करने वाली है. Pakistan का अपना अनुभव इस सोच को गलत साबित करता है. के-इलेक्ट्रिक इसका एक साफ उदाहरण है. प्राइवेटाइजेशन के बावजूद, बिजली के टैरिफ कम नहीं हुए हैं, बल्कि रिकॉर्ड लेवल तक बढ़ गए हैं.

केके/एबीएम

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