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Saturday, 24 October 2026
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पश्चिमी तमिलनाडु में मजदूरों की कमी से नारियल की खेती की लागत बढ़ी

पश्चिमी तमिलनाडु में मजदूरों की कमी से नारियल की खेती की लागत बढ़ी

कोयंबटूर, 23 जून . कोयंबटूर और तिरुप्पुर जिलों में नारियल किसानों को उत्पादन की बढ़ती लागत का सामना करना पड़ रहा है, क्योंकि मजदूरों की भारी कमी के कारण नारियल से छिलका उतारने और उनकी कटाई की लागत में तेज़ी से बढ़ोतरी हुई है.

पिछले दो महीनों में नारियल से छिलका उतारने की लागत 1 से बढ़कर 1.50 रुपये प्रति नारियल हो गई है, जो कि 50 प्रतिशत की बढ़ोतरी है. किसान इस बढ़ोतरी की वजह नारियल से जुड़े खेती के कामों में लगे मजदूरों की भारी कमी को मानते हैं. माना जाता है कि चुनाव के समय अपने घर लौटे कई प्रवासी मजदूरों के वापस न आने से मजदूरों की कमी और बढ़ गई है.

किसानों का कहना है कि मजदूरों के एक हिस्से को शायद काम के दूसरे मौके मिल गए हों या वे कहीं और बस गए हों, जिससे खेती के कामों के लिए मजदूरों की उपलब्धता कम हो गई है.

छिलका उतारने की लागत बढ़ने से उन किसानों पर आर्थिक बोझ और बढ़ गया है जो पहले से ही बाजार में उतार-चढ़ाव और खेती की बढ़ती लागत से जूझ रहे हैं.

छोटे और सीमांत किसान इससे सबसे अधिक प्रभावित हैं, क्योंकि वे खेती के कामों के लिए मजदूरों पर निर्भर रहते हैं और मोल-भाव करने की उनकी क्षमता भी कम होती है. इंडस्ट्री के जानकारों का कहना है कि मजदूरी की बढ़ी हुई लागत का असर बाजार में नारियल की कीमतों पर पड़ सकता है और कीमतें बढ़ सकती हैं.

जो व्यापारी बड़ी मात्रा में नारियल खरीदते हैं, उन्हें आसानी से मजदूर मिल जाते हैं, जबकि अकेले किसान और छोटे उत्पादकों को मजदूर पाने के लिए अधिक पैसे देने पड़ते हैं.

मजदूरों की कमी के कारण नारियल तोड़ने की लागत भी बढ़ गई है. हाल के हफ्तों में नारियल के पेड़ पर चढ़ने और नारियल तोड़ने का खर्च लगभग 2.25 से बढ़कर 3 रुपये प्रति नारियल हो गया है. पेड़ पर चढ़ने में माहिर लोगों की संख्या लगातार कम हो रही है, क्योंकि पुराने मजदूर रिटायर हो रहे हैं और नई पीढ़ी इस शारीरिक मेहनत वाले काम में बहुत कम दिलचस्पी दिखा रही है.

जानकारों का कहना है कि नारियल तोड़ने और छिलका उतारने जैसे कुछ खेती के कामों के लिए मशीनी समाधान मौजूद हैं. हालांकि, अधिक निवेश लागत और व्यवहारिक दिक्कतों की वजह से छोटे किसानों के बीच इनका इस्तेमाल अभी भी सीमित है.

बहुत ऊंचे नारियल के पेड़ों वाले बागानों में फसल काटने वाले उपकरण भी कम असरदार होते हैं.

मजदूरों की कमी का असर खेतों के बाहर भी महसूस किया जा रहा है. नारियल के छिलके कॉयर और कॉयर-पिथ उद्योगों के लिए एक अहम कच्चा माल हैं, जो उत्पादकों और व्यापारियों से लगातार सप्लाई पर निर्भर करते हैं.

छिलकों की उपलब्धता में कोई भी रुकावट या प्रोसेसिंग की लागत में बढ़ोतरी इन सेक्टरों में उत्पादन पर असर डाल सकती है और नारियल की खेती व उससे जुड़े उद्योगों पर निर्भर ग्रामीण आजीविका को प्रभावित कर सकती है.

मजदूरों की उपलब्धता में सुधार के कोई खास संकेत न मिलने से किसानों को डर है कि आने वाले महीनों में उत्पादन लागत बढ़ सकती है, जिससे तमिलनाडु के अहम कृषि सेक्टरों में से एक में मुनाफा और कम हो सकता है.

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ओपी/एएस

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