छत्रपति शिवाजी महाराज: 16 साल की उम्र में दुश्मनों को दिखाई ताकत, फिर तोरणा किला जीतकर शुरू किया साम्राज्य निर्माण

New Delhi, 18 फरवरी . “भले ही सबके हाथों में तलवार हो, लेकिन Government की स्थापना इच्छाशक्ति से ही होती है.” हिंदुस्तान में कई ऐसे वीर हुए हैं, जिन्होंने अपनी असाधारण वीरता, त्याग और बलिदान से भारतभूमि को धन्य किया है. उनमें छत्रपति शिवाजी महाराज का नाम सर्वोपरि है. यह एक ऐसा नाम है, जिसे सुनकर हर हिंदुस्तानी का सीना गर्व से चौड़ा हो जाता है. उनकी विरासत इतिहास के पन्नों पर एक अमिट छाप छोड़ती है, जो शासन में उत्कृष्टता की निरंतर खोज को प्रेरित करती है और आने वाली पीढ़ियों के लिए एक मार्गदर्शक है.

19 फरवरी, 1630 को शिवनेरी में जन्मे छत्रपति शिवाजी महाराज ने उन परिस्थितियों में जब भारी आक्रमण के साथ बाहरी साम्राज्य का विस्तार हो रहा था, एक साधारण परिवार से उठकर एक दल बनाया और धीरे-धीरे पूरा मराठा साम्राज्य खड़ा कर दिया. भले ही ज्यादा पढ़े-लिखे नहीं थे, लेकिन राष्ट्रवाद की भावना और ‘गुरु’ की शिक्षा का उनके जीवन पर गहरा प्रभाव पड़ा था.

इतिहासकार कपिल कुमार एक इंटरव्यू में कहते हैं, “छत्रपति शिवाजी महाराज का पूरा जीवन संघर्ष में बीता. एक साधारण परिवार से उठकर एक सेना खड़ी करना और लगातार मुगलों से लोहा लेना, ये साफ बताता है कि उनका जीवन संघर्षों में बीता. उस संघर्ष के जीवन के अंदर उनकी योग्यताएं उभरकर सामने आईं.”

16 वर्ष की आयु तक, शिवाजी ने वफादार अनुयायियों का एक समूह इकट्ठा कर लिया था और मराठा साम्राज्य की स्थापना के लिए अपना अभियान शुरू किया. उन्होंने 1645 में अपना पहला किला तोरणा जीत लिया, जो एक नेता के रूप में उनकी यात्रा का आरंभ था. अगले कुछ वर्षों में उन्होंने रणनीतिक रूप से कई किले और क्षेत्र अपने अधिकार में ले लिए, और गुरिल्ला युद्ध की रणनीति अपनाई जो उनकी पहचान बन गई.

शिवाजी के जीवन की सबसे महत्वपूर्ण घटनाओं में से एक 6 जून, 1674 को रायगढ़ किले में उनका छत्रपति के रूप में राज्याभिषेक था. यह घटना संप्रभुता की घोषणा और मराठा साम्राज्य की औपचारिक स्थापना थी. भव्यता से आयोजित राज्याभिषेक समारोह में ऐसे रीति-रिवाज और परंपराएं शामिल थीं जो एक स्वतंत्र शासक के रूप में उनकी वैधता को प्रमाणित करती थीं. यह एक प्रतीकात्मक क्षण था जो मुगल प्रभुत्व से मराठों की स्वायत्तता की आकांक्षा का प्रतिनिधित्व करता था.

शिवाजी जी का शासनकाल प्रगतिशील नीतियों और कुशल शासन व्यवस्था से सुशोभित था. उन्होंने तटरेखाओं की सुरक्षा में नौसेना की श्रेष्ठता के महत्व को समझते हुए एक सशक्त नौसेना बल की स्थापना की. उनके प्रशासनिक सुधारों में अनुशासित सैन्य संरचना का निर्माण, राजस्व सुधारों की शुरुआत और व्यापार को बढ़ावा देना शामिल था. उन्होंने धार्मिक सहिष्णुता पर भी बल दिया और विविधतापूर्ण समाज का समर्थन करते हुए अपनी सभी प्रजा के लिए न्याय सुनिश्चित किया.

शिवाजी महाराज का मुगल साम्राज्य और अन्य पड़ोसी राज्यों के साथ निरंतर संघर्ष चलता रहा. औरंगजेब की ओर से कैद किए जाने के बाद 1666 में आगरा से उनका भाग निकलना उनकी चतुराई और दृढ़ संकल्प का प्रमाण था. इस साहसिक पलायन ने उन्हें एक कुशल और दृढ़ नेता के रूप में स्थापित किया.

इतिहासकार कपिल कुमार एक इंटरव्यू में कहते हैं, “छत्रपति शिवाजी महाराज अपने दौर में ही नहीं, बल्कि आज भी देश के लिए प्रेरणादायक हैं. राष्ट्रीय आंदोलन के अंदर क्रांतिकारियों के लिए वे राष्ट्रवाद के प्रतीक थे. वे शोषण के विरुद्ध लड़ाई के प्रतीक थे. वे हिंदुस्तान के गौरव को पुनर्स्थापित करने के प्रतीक थे.”

वे कहते हैं, “वासुदेव फड़के से लेकर नेताजी सुभाष चंद्र बोस तक सभी ने एक प्रेरणा के रूप में शिवाजी महाराज को माना. ऐसा व्यक्तित्व कभी नहीं मरता है, बल्कि एक प्रतीक और आस्था के रूप में वह हमेशा जीवित रहता है.”

वे अपने दौर के एक महान शासक और युग निर्माता थे. वे सिर्फ मराठा राज्य के निर्माता नहीं थे, बल्कि मध्ययुगीन India के एक श्रेष्ठ रचनात्मक कार्य करने वाले अत्यंत बुद्धिमान व्यक्ति थे, जो अपनी विलक्षण वीरता, विजय की राजनीति और कूटनीति से एक साधारण अधीनस्थ जागीरदार के पथ से ऊपर उठकर छत्रपति कहलाए.

शिवाजी महाराज का निधन 3 अप्रैल, 1680 को रायगढ़ किले में हुआ. उनकी मृत्यु से एक खालीपन आ गया, लेकिन उनकी विरासत उनके उत्तराधिकारियों और मराठा साम्राज्य के माध्यम से कायम रही, जिसने मुगल सत्ता को चुनौती देना और अपने क्षेत्रों का विस्तार करना जारी रखा.

डीसीएच/डीकेपी

Leave a Comment