Saturday , 16 January 2021

चम्बल एक नदी 21वीं सदी कुंती, कर्ण की भूमि…!

(लेखक – नईम कुरेशी / )
मध्य प्रदेश के उत्तरी सिरे पर श्योपुर जिला अपने अनूठे, सौंदर्य, ऐतिहासिक व पुरातात्विक विरासत, सतरंगी संस्कृति, विलक्षण कलाओं का नायाब नमूना है. ये चम्बल संभाग का दरवाजा भी कहा जा सकता है. यहां के ऐतिहास की जानकारी 9वीं सदी से मिलने लगती है. सुन्दर तालाब हैं यहां भीमसरा से मिले पत्थर के औजार दूसरी तरफ गुफाओं से मिले कई भित्ती चित्र यह बताते हैं कि यहां प्रागैतिहासिक काल में भी मानव का निवास होता था.
श्योपुर के बारे में इतिहास में पहली बार साहित्यक व ऐतिहासिक जानकारी ग्वालियर (Gwalior) के तोमरों के दरबारी कवि खड़गराय के गोपाल आख्यान से मिली सीप नदी के किनारे बने गौड़ राजाओं का किला भी है जहां पिछले 30 सालों से आदिवासियों की धरोहरों का खजाना लाकर म्यूजियम बना दिया गया है. यहां नरसिंह महल एक भव्य स्मारक है जो राजपूत और मुगल शैली के बताये जाते हैं. यहां का दीवान-ए-आम और दरबार हाल पर सिंधिया शासकों के प्रभाव का बताया जाता है. शेरशाह सूरी के सिपेहसालार गूगोर के शासक मुनब्बर का भव्य मकबरा भी प्रस्तर शिल्प का नमूना है.
श्योपुर से 40 किलोमीटर दूर सीप, चम्बल, बनारस की नदियों का त्रिवेणी संगम भी है. यहां जन आस्था के केन्द्र लक्ष्मीनाथ व रामेश्वर महादेव के भव्य मंदिर हैं. ये इलाका चम्बल की संस्कृति की झलक दिखाता है.
कूनोवण्यजीव अभयारण-
श्योपुर जिले के विजयपुर (jaipur)तहसील के लगभग 60-70 ग्रामों की सीमा में कूनोवण्यजीव अभयारण 345 वर्ग किलोमीटर इलाके में फैला हुआ है. यहां के जीव जंतुओं के संरक्षण के लिए इसे 1981 में मध्य प्रदेश सरकार ने स्थापित कराया था. यहां बाघ, तेंदुआ, चीतल, सांभर काला हिरण, चिंकारा, भालू, नीलगाय, चौसिंहा, भेड़िये, जंगली बिल्ली, लोमड़ी, लकड़बग्गा, मोर, काला तीतर, कोबरा नाग आदि पशु पक्षियों को आसानी से देखा जा सकता है. यहां गुजरात (Gujarat) से बब्बर शेर भी लाकर बसाये गये हैं. प्राकृतिक मनोहारी चित्रों के बीच यहां सिंधिया रियासत के दौर में कूनो नदी के किनारे एक सुन्दर डाक बंगला भी बनवाया गया है. यहां रेलवे (Railway)कोच को भोजन कक्ष के रूप में उपयोग किया जाना भी एक सुखद अनुभव है.
इस इलाके में सोइऔ के गढ़ में नाथों की सुन्दर शिल्प से सज्जित छत्रियों के सुन्दर नमूने हैं. सत्ती स्तम्भ व तमाम पुरातत्व वैभव के सुन्दर स्मारक हैं. यहीं पालनपुर की गढ़ी के रूप में सुन्दर छोटा सा किला भी है जिसमें सुन्दर मंदिर व कचहरी भी हैं. श्योपुर से महज 35 किलोमीटर दूर ही मानपुर का किला भी है जो श्योपुर के गौड़ राजाओं का है. इसमें राग-रागनियों के सुन्दर चित्र बनाये गये हैं.
श्योपुर के वैभव व जंगलों के क्षेत्र में सीप नदी के किनारे अनेकों स्थान पर सुन्दर बगीचे कलात्मक स्नानागारों से युक्त महलों से निर्मित काशीपुर की सुन्दर गढ़ी भी हैं. यहां भी सुन्दर भित्ति चित्र बने हैं. इसी के पास 9वीं सदी की शिवगढ़ी मंदिर भी है जो प्रमुख पुरातत्व स्मारकों में शुमार है.
विजयपुर (jaipur)का किला- कूनो नदी के किनारे नदी तट पर ये किला चम्बल की संस्कृति की एक बड़ी धरोहर माना जाता है. इसे करोली के राजा विजय सिंह ने 14वीं 15वीं सदी में बनवाया था देखते ही बन पड़ा है.
श्योपुर से महज 20 किलोमीटर दूर श्योपुर बड़ौदा मार्ग पर “पुरानी हवेली” नया गांव है. यहां बसों से भी अपने निजी वाहनों से भी आसानी से पहुंचा जा सकता है. इसे बड़ौदा के गौर राजपूत जमींदारों ने निर्माण कराया था. यहां की इमारतों में सुन्दर झरोखे भी हैं. इसी के आसपास खींची राजाओं द्वारा निर्मित बड़ौदा का किला भी काफी सुन्दर स्मारक के तौर पर जाना जाता है. यहीं इसके आसपास हासिलदेव का एक प्राचीन मंदिर है जहां पुरातत्व महत्व की तमाम मूर्तियां बिखरी पड़ी हैं. यहीं हरिपुर के प्राचीन मंदिर भी हैं. घनघोर जंगलों में जैन व शिव मंदिर हैं यहां जो अच्छी हालातों में नहीं हैं. यहां ठोठरगढ़ी भी है जो करोली के शासक गोपाल सिंह ने निर्मित कराई थी. पार्वती और चम्बल नदी के संगम स्थल को रामेश्वर का संगम कहा जाता है. यहां श्योपुर से 55 किलोमीटर दूर डोबकुंड काफी प्राचीन माना जाता है जो गोरस-यामपुर मार्ग पर है. यहीं कच्छपघात राजाओं की राजधानी होने के प्रमाण इतिहास में दर्ज हैं.
श्योपुर की जड़ी बूटियाँ-
महिला सहारिया आदिवासियों के जेबरों का भी एक अनोखा अंदाज देखा जाता है. जो गिलट व प्लास्टिक आदि से ज्यादा बनाये जाते हैं जो यहां की महिलायें बड़े चाव से पहनती हैं. सहारिया लोगों की आय का प्रमुख साधन आयुर्वेदिक व यूनानी चिकित्सा में काम आने वाली खास जड़ी बूटियाँ भी हैं. जिसमें सफेद मूसली, कई तरह की गोंद, मैदा छाल, गोमची, बिदारी कंद सतावर सहित सांप के काटने पर दी जाने वाली औषधियां खासतौर से हैं. सहरिया संस्कृति में रुचि रखने वालों के लिए चम्बल इलाके के श्योपुर में सहरिया संग्रहालय का अवलोकन काफी महत्वपूर्ण माना जाता है. आदिवासी संस्कृति से जुड़े चित्रों, लोकगीत, शैलचित्रों को देखकर आनंदित हुए बगैर आप रह नहीं पायेंगे.
मुरैना जिला-
श्योपुर से लगा ही हुआ चम्बल इलाके का मुरैना शहर है जो कुआंरी और चम्बल नदियों के बीच है जो सबलगढ़, कैलारस से ही शुरू हो जाता है और अम्बाह पोरसा तक है. ये भगवान कृष्ण की बुआ रानी कुंती का भी घर रहा था कुंतलपुर ग्वालियर (Gwalior) और मुरैना के बीच बानमौर औद्योगिक क्षेत्र से लगा काफी सुन्दर इलाका है. यहीं प्रसिद्ध योद्धा कर्ण का भी जन्म हुआ था. सबलगढ़ से मुरैना के बीच जौरा इलाका है जहां का गांधी शांति प्रतिष्ठान का काफी नाम और काम है. 1972 में इसी गांधी आश्रम के माध्यम से जय प्रकाश नारायण जी ने मध्य प्रदेश सरकार के सहयोग से 400 बागियों का गांधीजी के चित्र के सामने अपने हथियार डलवाये थे. इसी के 10-15 किलोमीटर दूर पहाड़गढ़ क्षेत्र है जहां की लाखों वर्ष पुरानी लिखी छाज के शैलचित्र बने हैं जो काफी प्रसिद्ध हैं.
चम्बल इलाके में 9वीं सदी के गुर्जर प्रतिहार कालीन शिव मंदिरों का समूह पड़ावली, मितावली, नरेसर आदि में हैं जहां के मंदिरों को 2005 में भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण के के.के.मोहम्मद ने संवारकर पुन: जीवित कर दिया था. मुरैना से 20 किलोमीटर व ग्वालियर (Gwalior) से 30 किलोमीटर पर बानमौर औद्योगिक क्षेत्र व मालनपुर औद्योगिक क्षेत्र के बीचों बीच सड़क से मात्र 10 किलोमीटर दूरी पर मंदिर समूह बटेश्वर है. मुरैना सरसों के लिए भी प्रसिद्ध है.
मुरैना शहर में पिछले 10 सालों में स्थानीय सांसद (Member of parliament) व केन्द्रीय मंत्री नरेन्द्र तोमर ने एक सुन्दर म्यूजियम का निर्माण कराया है जहां चम्बल क्षेत्र की अनेक सुन्दर मूर्तियां व चम्बल की विरासतों को सहेज कर रखा गया है. चम्बल के मुरैना में घड़ियाल, मगरमच्छ, कछुओं, मछलियों खासतौर से डालफिन मछलियों का भव्य अभयारण भी देखने लायक है. यहां 3 हजार से भी ज्यादा घड़ियाल होना कहे जाते हैं. यहां पोरसा के पास ककनमठ का भव्य मंदिर है जो 11वीं सदी का है जिसे कछवाहा शासकों ने अपनी रानी ककनावति के लिये बनवाया था जो 8 फीट ऊँचे चबूतरे पर बना है रथ मंदिर है यहीं सिहोनियां ग्राम में शांतिनाथ, आदिनाथ आदि के भी सुन्दर जैन मंदिर हैं. यहीं एती ग्राम का सूर्य मंदिर भी है जो 11वीं सदी में रिठौरा कला के पास बना है. इसकी काफी मान्यता है. ये सूर्य देव का मंदिर है.
भिण्ड जिला-
चम्बल के भिण्ड जिले का भी काफी नाम है. ये विभिण्डक ऋषि के नाम पर है. विभिण्डक ऋषि महाभारत काल में हुए थे यहां अटेर का किला भदावर राजाओं की राजधानी के नाम पर प्रसिद्ध है. इसे बदनसिंह राजा ने बनवाया था. गोहद के जाट राजाओं का किला भी काफी बड़ा व सुन्दर है. आलमपुर में मल्हाराव होलकर की छत्री भी यहां के स्मारकों में काफी सुन्दर व भव्य है.
भिण्ड जिले में अनेक जैन मंदिर होने का प्रमाण भी है. मेहगांव से 18 किलोमीटर बरासोजी महगांव तहसील का कस्बा है जो वैशाली नदी के किनारे बसा है. अपने प्राचीन मंदिरों के लिये खासतौर से जैन मंदिरों के लिए प्रसिद्ध है. यही दिगम्बर जैन मंदिर क्षेत्र पावई भी है जहां अनेकों भगवान नेमिनाथ व अन्य जैन भगवानों की मूर्तियां हैं. यहीं से नजदीक दिगम्बर जैन अति क्षेत्र बरही भी है जहां अनेकों जैन मंदिर हैं. यहीं गोहद के समीप सूर्य मंदिर भारोली ग्राम में है जो काफी प्राचीन है.
परशुराम जी की जन्म स्थली-
भिण्ड के गोदमी कस्बे में प्राचीन गौतम ऋषि की नगरी है गौतमपुर में यहां कुछ इतिहासकार मानते हैं कौरवों ने पांडवों की हत्या (Murder) हेतु लाक्षागृह भी बनवाया था जो लहार कस्बे में था. यही सिंध नदी के किनारे नारदा नामक स्थान को ऋषि नारद की तपस्थली भी कहा जाता है.
गोहद के मंदिर मऊ के समीप माता रेणु का मंदिर कहा जाता है. जहां भगवान परशुराम का जन्म स्थल माना जाता है. कहा जाता है कि बड़े होने पर उन्होंने अपने पिता के आदेश पर अपनी माता का सिर काट दिया था. इसीलिए इस मंदिर को माता रेणुका का मंदिर माना जाता है. यहां रेणुका की मूर्ति स्थापित है जिसका सिर धड़ से अलग है. चम्बल नदी इन्दौर (Indore) मऊ के ग्राम से निकलकर श्योपुर से मुरैना, भिण्ड, लहार, जगम्मनपुर, जालौन होते हुए यमुना से मिल जाती है. इसकी संस्कृति बहादुरी की संस्कृति मानी जाती है. भिण्ड अकेले जिले में यहां से लगभग एक लाख लोग भारतीय सेना का गौरव बने हुए हैं. चम्बल लगभग 400 किलोमीटर लम्बी है कुछ इतिहासकार मानते हैं. ये जालौन के पंचनदा इलाके में यमुना नदी में मिलकर लुप्त हो जाती है. इसका इतिहास व संस्कृति काफी भव्य व विख्यात है. देश के इतिहासकार मानते हैं.

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