Monday , 14 June 2021

बेशर्मी की इन्तहा भारतीय लोकतंत्र को बदनाम करने की अन्तर्राष्ट्रीय साजिश….?

(लेखक- ओमप्रकाश मेहता / )
दुनिया के सबसे आदर्श लोकतंत्री देश भारत के लोकतंत्र को बदनाम करने की अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर गंभीर साजिशें शुरू हो गई है और इस साजिश में भारत के प्रतिपक्षी राष्ट्रीय दल व उनके नेता भी शामिल हो गए है अमेरिकी सरकार के ’थिंकटेक‘ प्राईम हाउस ने 2021 में ”विश्व में आजादी लोकतंत्र की घेराबंदी“ शीर्षक से एक रिपोर्ट जारी की है, इसमें भारत की रेंकिंग घटाकर ”आंशिक आजाद देशों की श्रेणी में कर दी है. वर्ष 2020 में इसने हमारे देश को ’आजाद‘ श्रेणी में रखा था, संस्था ने कहा है कि 2014 में सरकार बदलने के बाद भारत में नागरिक स्वतंत्रता हनन बढ गया है, इस रिपोर्ट में ’राजद्रोह‘ के कानून का इस्तेमाल मुस्लिमों पर हमले और ’लॉक डाउन‘ के दौरान लगाए गए प्रतिबंधों का जिक्र है, रिपोर्ट में भारत का स्कोर 71 से घटाकर 62 हो गया है, रैंकिंग भी 83 से फिसलकर 88 पर आ गई है ’थिंकटेंक‘ ने कहा कि चीन तानाशाही देशों के ब ाद अब अमेरिका के साथ भारत जैसे देश में अभिव्यक्त की आजादी कम हो रही है. भारत की यह 88 वाली रैंकिंग 211 देशों की सूची में दर्शायी गई है. रिपोर्ट में कहा गया है कि भारत में बिना किसी पूर्व तैयारी के जहां नोटबंदी की गई, वहीं बिना तैयारी के लॉक डाउन भी गलाया गया. अब इस रैंकिंग के बाद भारत का स्कोर इक्वाडोर की बराबरी में आ गया है.
रिपोर्ट में चीन को लोकतंत्र व नागरिक आजादी के मामले में सबसे बुरा बताया है, महामारी (Epidemic) के दौरान नगारिकों पर सैंसरशिप अभियान चलाया गया. अमेरिका में डोनाल्ड ट्रम्प शासन के दौरान भी लोकतांत्रिक गिरावट हुई. उल्लेखनीय है कि ’फ्रीडम हाउस‘ राजनीतिक अधिकारों व नागरिक स्वतंत्रता को लेकर रिपोर्ट जारी करता आया है, जनवरी 2020 से 31 दिसम्बर 2020 तक 25 बिन्दुओं को लेकर 198 देशों व 16 प्रदेशों पर शौध व सर्वे किया गया था. उसी के आधार पर यह रिपोर्ट जारी की गई है.
इसी तरह अमेरिका के बहु प्रसारित पत्रिका ’इकॉनामिस्ट‘ ने भी पिछले दिनों दुनिया में लोकतंत्र की स्थिति पर सर्वे किया था, पत्रिका के अनुसार भारत में लोकतांत्रिक संख्याएं सरकार की मनमानी की शिकार है. अपनी रिपोर्ट में ’द इकोनामिस्ट‘ ने लिखा है कि सैनिक विद्रोह के बजाए चुनाव जीतकर आए नेता लोकतांत्रिक संस्थाओं के लिए खतरा बने हुए है, दुनिया भर में लोकतंत्र पर सत्ताधीशों का कहर व्याप्त है, भारत सहित कई देशों में निर्वाचित सरकारों पर काबिज नेता मनमानी कर रहे है, अमेरिका में न्याय पालिका और अधिकारियों की पेशेवर कार्यशैली ने डोनाल्ड ट्रम्प पर अंकुश लगाया था.
इसी रिपोर्ट में भारत व यहां की सरकार के बारे में बहुत कुछ लिखा गया है, कहा गया है कि भारत में न्यायपालिका, चुनाव आयोग सहित कई संवैधानिक संगठन व संस्थाएं सत्ताधारी भारतीय जनता पार्टी का दबाव महसूस कर रहे है. रिपोर्ट में अपने इस विचार के पक्ष में अनेक सबूत भी दिए गए है.
इसी तरह अमेरिकी इन सर्वे एजेंसियों की तरह ही स्वीडन की एक संस्था ”वी डेम इंस्टीट्यूट“ ने हाल ही में जो रिपोर्ट जारी की उसमें कहा गया है कि सेंसरशिप के मामले में भारत अब पाकिस्तान की तरह ’एकतंत्र‘ हो गया है और अब इसी कारण भारत की स्थिति बंगलादेश से भी बदत्तर हो रही है इसी रिपोर्ट में भारत को लोकतंत्री के बजाए ’एकतंत्री‘ देश बताया गया है तथा भारत को हंगरी व तुर्की के साथ लोकतंत्र के कई पहलुओं पर प्रतिबंध लगाने के आरोप में ”इलेक्ट्रोरल ऑटोक्रेसी“ (चुनावी तानाशाही) में वर्गीकृत किया गया है, कहा गया है कि 2014 के बाद से भारत में ’अधिनायकवाद‘ की शुरूआत हो गई है. इसी तरह अमेरिका व स्वीडन के साथ कई अन्य देश भी भारतीय लोकतंत्र को बदनाम करने की सजिश में शामिल हो गए है.
यहाँ यह भी उल्लेखनीय है कि पिछले दिनों ब्रिटेन की संसद में भी भारतीय लोकतंत्र व यहां की सरकार को लेकर अनेक विरोधी टिप्पणियां की गई थी तथा ब्रिटिश पार्लियामेंट में भारतीय सरकार पर लम्बी-चौड़ी बहस भी हुई थी, जिसमें अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर भारत सरकार की काफी आलोचना की गई थी और भारत सरकार ने भारत स्थित ब्रिटिश राजदूत को बुलाकर उसके सामने वैधानिक रूप से नाराजी व्यक्त करते हुए आपत्ती भी दर्ज कराई थी.
यहाँ सबसे अधिक खेद का विषय यह है कि हमारे देश के प्रतिपक्षी दलों के नेता इन विदेशी रिपोर्टों को आधार बनाकर हमारे देश की मोदी सरकार की आलोचना कर रहे है, जिसका ताजा उदाहरण कांग्रेसी नेता राहुल गांधी का वह बयान है जिसमें उन्होंने भारत को अब लोकतंत्री देश मानने से ही इंकार कर दिया था, राहुल के इस बयान के आधार पर समाजवादी पार्टी सहित कई प्रतिपक्षी दलों के नेताओं ने भी मोदी सरकार की जमकर आलोचना की थी.
अब भारत सरकार की यह प्राथमिकता होना चाहिए कि अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर भारतीय लोकतंत्र व भारत सरकार की बदनामी करने का यह अभियान कहां से व किसने शुरू किया तथा इसके पीछे इन विदेशी संस्थानों का मूल मकसद क्या है? क्योंकि यही सब आगे भी चलता रहा तो भारत की अन्तर्राष्ट्रीय स्तर मौजूदा साख खत्म हो जाएगी और लोकतंत्री देशों के नेतृत्व का ध्वज हमारे हाथों से छीन लिया जाएगा, इसलिए इस अभियान को रोकने की दिशा में भारत सरकार को अब प्राथमिकता के आधार पर सक्रिय हो जाना चाहिए. संभव है इसके पीछे मोदी की अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर बढ़ रही लोकप्रियता का कारण हो?

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