झारखंड में 4 मार्च से ‘बाहा’ की बहार, पानी और फूलों संग खेलने-झूमने का अनूठा त्योहार

रांची, 2 मार्च . झारखंड के आदिवासी बहुल इलाकों में आगामी 4 मार्च से ‘बाहा’ की धूम रहेगी. पानी और फूलों के साथ खेलने-झूमने की अनूठी परंपराओं वाला यह त्योहार मूलतः संथाल आदिवासी समाज में मनाया जाता है.

फागुन महीने की पांचवीं तिथि से शुरू होने वाले इस त्योहार का सिलसिला अलग-अलग गांवों में पूरे महीने तक जारी रहता है. झारखंड के गांवों के साथ-साथ देश के कई अन्य राज्यों और देश के बाहर नेपाल, बांग्लादेश, म्यांमार, भूटान तथा अमेरिका में बसे संथाल समाज के लोग बाहा पर्व मनाते हैं.

‘होली’ की ही तरह ‘बाहा’ भी जनजीवन में उमंग और मस्ती घोलने वाला त्योहार है, लेकिन इसमें रंगों की जगह एक-दूसरे पर पानी और फूलों की बारिश होती है. संथाली भाषा में बाहा का मतलब है फूलों का पर्व. इस दिन लोग तीर-धनुष की पूजा करते हैं. ढोल-नगाड़ों की थाप पर जमकर थिरकते हैं और एक-दूसरे पर पानी डालते हैं.

बाहा की परंपराएं, मान्यताएं और वर्जनाएं अपने-आप में अनूठी हैं. किसी पुरुष को इजाजत नहीं है कि वह किसी कुंआरी लड़की पर रंग डाले. इस समाज में रंग-गुलाल लगाने के खास मायने हैं. अगर किसी युवक ने समाज में किसी कुंआरी लड़की पर रंग डाल दिया तो उसे या तो लड़की से शादी करनी पड़ती है या भारी जुर्माना भरना पड़ता है.

बाहा के दिन पानी डालने को लेकर भी नियम है. जिस रिश्ते में मजाक चलता है, पानी की होली उसी के साथ खेली जा सकती है.

यदि किसी भी युवक ने किसी कुंवारी लड़की पर रंग डाला तो समाज की पंचायत लड़की से उसकी शादी करवा देती है. अगर लड़की को शादी का प्रस्ताव मंजूर नहीं हुआ तो समाज रंग डालने के जुर्म में युवक की सारी संपत्ति लड़की के नाम करने की सजा सुना सकता है. यह नियम झारखंड के पश्चिम सिंहभूम से लेकर पश्चिम बंगाल के जलपाईगुड़ी तक के इलाके में प्रचलित है.

पूर्वी सिंहभूम जिले में संथालों के बाहा पर्व की परंपरा के बारे में देशप्राणिक मधु सोरेन ने बताया कि संथाल समाज में प्रकृति की पूजा का रिवाज है. बाहा पर्व में साल के फूल और पत्ते समाज के लोग कान में लगाते हैं. इसका अर्थ है कि जिस तरह पत्ते का रंग नहीं बदलता, हमारा समाज भी अपनी परंपरा को अक्षुण्ण रखेगा.

बाहा पर्व पर पूजा कराने वाले को नायकी बाबा के रूप में जाना जाता है. पूजा के बाद वह सखुआ, महुआ और साल के फूल बांटते हैं. इस पूजा के साथ संथाल समाज में शादी-विवाह का सिलसिला शुरू होता है. संथाल समाज में ही कुछ जगहों पर बाहा पर्व के बाद वन्यजीवों के शिकार की परंपरा है. शिकार में जो वन्यजीव मारा जाता है, उसे पका कर सामूहिक भोज का आयोजन किया जाता है. झारखंड के कोल्हान प्रमंडल में बड़ी तादाद में रहने वाले संथाल आदिवासी समाज के धर्मगुरुओं ने इस वर्ष भी बाहा को लेकर पूरे समाज के लिए निर्देश जारी किया है.

संथाली पुजारी माझी बाबा भोक्ता हांसदा ने बताया कि बाहा के दौरान पुरुषों के लिए काला शर्ट, काली धोती और पीली धोती पहनना पूरी तरह से वर्जित रहेगा. महिलाओं के लिए पंची साड़ी, काली साड़ी, जुड़े में गजरा सजाना और गुलाब फूल का व्यवहार पूरी तरह से वर्जित रहेगा.

एसएनसी/एकेजे