Thursday , 25 February 2021

60 के दशक के अंत से फिल्म जगत में काम करना शुरू कर दिया

नई दिल्ली (New Delhi) . हिंदी सिनेमा के इतिहास में 1970 के दशक में नए विचारों, नए प्रयोगों और एक्शन फिल्मों की एक नई शैली का प्रवाह देखा गया. यह समय ऐसा था जिसे गैर-पारंपरिक फिल्मों के लिए स्वर्णिम वर्ष कहा जाता है, क्यूंकि इसी दौरान भारतीय सिनेमा में नई तकनीक का आगाज भी हुआ था. फिल्म निर्माता राहुल रवैल ने भारतीय अंतर्राष्ट्रीय फिल्म महोत्सव-आईएफएफआई के 51वें संस्करण में आज वर्चुअल वार्तालाप के दौरान यह बात कही.
उन्होंने आईएफएफआई में आज 50, 60 और 70 के दशक में बनने वाली फिल्मों के निर्माण पर चर्चा की, राहुल रवैल ने बीते दौर में हिंदी फिल्म उद्योग के विकास की अद्भुत यात्रा के बारे में वर्चुअल रूप से भाग लेने वाले प्रतिनिधियों से चर्चा की.

फिल्म-निर्माता राहुल रवैल ने कहा कि, “उन्होंने 60 के दशक के अंत से फिल्म जगत में काम करना शुरू कर दिया था और दिग्गज राज कपूर के सहायक के रूप में अपना करियर प्रारंभ किया. उन्होंने बताया कि, के.आसिफ और महमूद जैसे कलाकारों ने 60 के दशक में शानदार सेटों के साथ फिल्में बनाईं, इसके बाद 70 के दशक में बाबूराम ईशारा की फिल्म ‘चेतना’ की लोकेशन पर हुई शूटिंग 25 से 30 दिनों में ही पूरी कर ली गई, जिससे हिंदी सिनेमा में एक क्रांति की शुरुआत हुई और उन दिनों ये बात बेहद असाधारण थी”. राहुल रवैल ने कहा कि, विजय आनंद की ‘जॉनी मेरा नाम’ का जिक्र किया जिसमें देव-आनंद मुख्य अभिनेता थे. उस फिल्म ने भी 70 के दौर में एक्शन-ओरिएंटेड, बड़े प्लॉट वाली फिल्मों के एक नए रूप को जन्म दिया. जिस समय हिंदी फिल्म-उद्योग में कारोबार तेजी से बढ़ रहा था तब 70 के दशक में फिल्म जंजीर में अमिताभ बच्चन द्वारा निभाए गए किरदार के रूप में एक ‘अपरंपरागत नायक’ देखा गया था. इसने ‘एंग्री यंग मैन’ की छवि को दर्शकों के सामने रखा और फिर एक नया ब्रांड स्थापित हुआ.

राहुल रवैल ने बताया कि, 1973 में नासिर हुसैन की फिल्म ‘यादों की बारात’ आई, जिससे एक बेहतरीन स्क्रिप्ट के साथ सलीम-जावेद की जोड़ी का आगमन हुआ. राज कपूर ने ‘बॉबी’ के ज़रिये ऋषि कपूर और डिंपल कपाड़िया को पेश किया, इस फिल्म ने भी एक नया चलन शुरू किया. उन्होंने कहा कि, “ये फिल्में एक बदलाव ला रही थीं और फिल्म बनाने के पूरे तालमेल में इजाफा कर रही थीं. रवैल हैं, उन दिनों वह कम उम्र के अभिनेता थे. फिल्म स्टार जीतेन्द्र भी हिंदी सिनेमा की दुनिया में एक नई अपील और नई शैली के साथ बड़े पर्दे पर सामने आए. वर्चुअल वार्तालाप के इस मौके पर राहुल रवैल ने फिल्म दीवार को भी याद किया – यह शानदार ढंग से बनाई गई एक फिल्म थी जो यश चोपड़ा को उस दौर में महान ऊंचाइयों पर ले गई. यश चोपड़ा त्रिशूल जैसी और भी यादगार फिल्मों के साथ आगे बढ़े.

Please share this news