सरकार बदलने के बाद कैंपस में विरोध प्रदर्शन पर लौटी एसएफआई, पीएससी विवाद पर चुप्पी से उठे सवाल

तिरुवनंतपुरम, 3 नवंबर . सीपीआई (एम) की स्टूडेंट विंग, स्टूडेंट्स फेडरेशन ऑफ इंडिया (एसएफआई), केरल में Government बदलने के बाद कैंपस में फिर से सक्रिय हो गई है. हालांकि, पब्लिक सर्विस कमीशन (पीएससी) भर्ती विवाद पर एसएफआई की चुप्पी ने ध्यान खींचा है, जिसकी आलोचना भी हुई है.
Chief Minister वी.डी. सतीशन के नेतृत्व वाली कांग्रेस Government के सत्ता में आने के बाद से, कालीकट, कलाडी और केरल यूनिवर्सिटी सहित कई यूनिवर्सिटी में एसएफआई के विरोध प्रदर्शन की खबरें आई हैं. इनमें से कुछ प्रदर्शनों के कारण Police के साथ झड़पें भी हुई हैं. जो बात ध्यान खींच रही है, वह सिर्फ एसएफआई का सड़क की राजनीति में वापस आना नहीं है बल्कि चल रहे पब्लिक सर्विस कमीशन (पीएससी) भर्ती विवाद पर इसकी चुप्पी पर सवाल उठ रहे हैं.
पिनाराई विजयन Government के दौरान एसएफआई के विरोध प्रदर्शन काफी कम होते थे. एक बड़ा अपवाद तत्कालीन गवर्नर आरिफ मोहम्मद खान के खिलाफ इसका आंदोलन था, जो राज्य यूनिवर्सिटी के चांसलर भी थे. अब, Government बदलने के साथ, छात्र संगठन फिर से आक्रामक मोड में है. पिछले हफ्ते कोच्चि के महाराजा कॉलेज में हुई घटना खास तौर पर चौंकाने वाली थी.
राज्य के हायर एजुकेशन मिनिस्टर रोजी एम. जॉन को एसएफआई कार्यकर्ताओं के विरोध का सामना करना पड़ा था, जब वे एक कॉन्वोकेशन सेरेमनी में शामिल होने पहुंचे थे. जिससे कैंपस में आए Political माहौल में बदलाव को देखा जा सकता है. सतीशन Government और गृह मंत्री रमेश चेन्निथला ने ऐसे विरोध प्रदर्शनों पर कड़ा रुख अपनाया है और Police के साथ टकराव ज्यादा दिखने लगे हैं. लेकिन पीएससी मुद्दे पर एसएफआई की चुप्पी ने कई लोगों को हैरान कर दिया है.
पीएससी परीक्षाओं और नियुक्तियों में कथित गड़बड़ियों की जांच में पहले ही कमीशन के एक सीनियर अधिकारी और एक पुराने कर्मचारी को गिरफ्तार किया जा चुका है. स्पेशल इन्वेस्टिगेशन टीम ने पीएससी चेयरमैन एम.आर. बैजू और तीन अन्य सदस्यों से पूछताछ की है. 16 सदस्यों वाले कमीशन के बाकी 12 सदस्यों को भी नोटिस जारी किए गए हैं, जिन्हें पिछली विजयन Government के दौरान नियुक्त किया गया था.
यह मुद्दा उस रिक्रूटमेंट सिस्टम की विश्वसनीयता से जुड़ा है, जिस पर हजारों युवा Governmentी नौकरियों के लिए निर्भर हैं. यह एक ऐसा मामला भी है जो सीधे तौर पर छात्रों और नौकरी चाहने वालों को प्रभावित करता है, एक ऐसा वर्ग जिसका प्रतिनिधित्व एसएफआई करने का दावा करता है. इससे ऑर्गनाइजेशन की चुप्पी को नजरअंदाज करना मुश्किल हो जाता है.
Government बदलने पर एसएफआई भले ही सड़कों पर वापस आ गया हो लेकिन हजारों युवा नौकरी ढूंढने वालों के भविष्य पर असर डालने वाले मुद्दे पर बोलने में उसकी हिचकिचाहट एक बड़ा सवाल खड़ा करती है. जब स्टूडेंट्स और नौकरी चाहने वालों के हित दांव पर लगे हों तो स्टूडेंट ऑर्गनाइजेशन कहां हैं.
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एसडी/पीएम


