पूर्वोत्तर भारत बन सकता है दक्षिण और दक्षिण-पूर्व एशिया का रणनीतिक प्रवेश द्वार: विशेषज्ञ

गुवाहाटी, 6 नवंबर . विशेषज्ञों ने कहा है कि India का पूर्वोत्तर क्षेत्र अपनी रणनीतिक भौगोलिक स्थिति, क्षेत्रीय संपर्क क्षमता और बढ़ते भू-Political महत्व के कारण दक्षिण एशिया और दक्षिण-पूर्व एशिया के बीच एक प्रमुख प्रवेश द्वार के रूप में उभर सकता है. गुवाहाटी में आयोजित दो दिवसीय शैक्षणिक विमर्श के दौरान इस क्षेत्र की कनेक्टिविटी, सीमा प्रबंधन, आर्थिक एकीकरण और रणनीतिक अवसरों पर विशेषज्ञों ने व्यापक चर्चा की.
यह संवाद “बदलते भू-Political परिदृश्य में पूर्वोत्तर India : कनेक्टिविटी, सीमा क्षेत्र, फ्रंटियर गवर्नेंस और रणनीतिक अवसर” विषय पर चिंतन रिसर्च फाउंडेशन (सीआरएफ) द्वारा गिरिजानंद चौधरी विश्वविद्यालय (जीसीयू) और असम डॉन बॉस्को विश्वविद्यालय (एडीबीयू) के सहयोग से 4 और 5 नवंबर को आयोजित किया गया.
इस दौरान, विशेषज्ञों ने जोर देकर कहा कि पूर्वोत्तर India को केवल एक सीमावर्ती क्षेत्र या ट्रांजिट कॉरिडोर के रूप में नहीं, बल्कि India की क्षेत्रीय और अंतरराष्ट्रीय सहभागिता के सक्रिय भागीदार के रूप में देखा जाना चाहिए.
वक्ताओं ने कहा कि बांग्लादेश, भूटान, म्यांमार और दक्षिण-पूर्व एशिया के अन्य देशों से पूर्वोत्तर India की निकटता इसे सीमा पार व्यापार, ऊर्जा सहयोग, संपर्क परियोजनाओं और जन-से-जन संबंधों के लिए विशेष अवसर प्रदान करती है. हालांकि इन अवसरों के साथ सीमा प्रबंधन, सुरक्षा, अवैध प्रवासन, बुनियादी ढांचे की कमी और सीमावर्ती समुदायों की अपेक्षाओं जैसी चुनौतियों से संतुलित तरीके से निPatna भी आवश्यक होगा.
जीसीयू में आयोजित “बांग्लादेश-पूर्वोत्तर India इंटरफेस : कनेक्टिविटी, सीमा क्षेत्र और भू-राजनीति” कार्यक्रम में सीआरएफ के अध्यक्ष शिशिर प्रियदर्शी ने बांग्लादेश के साथ निरंतर संवाद और सहयोग की आवश्यकता पर जोर दिया. उन्होंने “वुडपेकर अप्रोच” का उल्लेख करते हुए कहा कि धैर्य और निरंतर प्रयासों के माध्यम से दोनों पक्षों के बीच सहयोग को और मजबूत किया जा सकता है. उन्होंने India की विदेश नीति में पूर्वोत्तर India के दृष्टिकोण को अधिक महत्व देने की भी वकालत की.
चर्चा के दौरान विशेषज्ञों ने कहा कि बांग्लादेश के बंदरगाह, अंतर्देशीय जलमार्ग और सीमा पार परिवहन नेटवर्क पूर्वोत्तर India की कनेक्टिविटी को मजबूत करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं. इसके साथ ही बंगाल की खाड़ी के बढ़ते भू-Political महत्व, बाहरी शक्तियों के प्रभाव और सीमा क्षेत्रों में आर्थिक सहयोग की संभावनाओं पर भी विचार किया गया.
दूसरे दिन एडीबीयू में आयोजित “बदलते भू-Political परिदृश्य में India का पूर्वोत्तर : कनेक्टिविटी, फ्रंटियर गवर्नेंस और रणनीतिक अवसर” विषयक संगोष्ठी में एडीबीयू के कुलपति जोस पालेली ने कहा कि अंतरराष्ट्रीय सीमाओं को केवल सुरक्षा दृष्टिकोण से नहीं बल्कि आर्थिक अवसर और सामाजिक संपर्क के केंद्र के रूप में भी देखा जाना चाहिए. उन्होंने सीमावर्ती समुदायों को विकास और शासन व्यवस्था का महत्वपूर्ण भागीदार बनाने की आवश्यकता पर बल दिया.
दोनों दिनों की चर्चाओं में अखौरा-अगरतला रेल लिंक, बांग्लादेश के समुद्री बंदरगाहों तक पहुंच, अंतर्देशीय जलमार्गों तथा सड़क नेटवर्क की उपयोगिता पर विशेष ध्यान दिया गया. साथ ही भारत-म्यांमार-थाईलैंड त्रिपक्षीय राजमार्ग परियोजना और कलादान मल्टी-मॉडल ट्रांजिट ट्रांसपोर्ट परियोजना जैसी क्षेत्रीय संपर्क परियोजनाओं के महत्व को भी रेखांकित किया गया.
विशेषज्ञों ने पूर्वोत्तर क्षेत्र के भीतर आपसी संपर्क बेहतर बनाने, सीमा अवसंरचना को उन्नत करने, सीमा शुल्क प्रक्रियाओं को सरल बनाने और संस्थागत समन्वय बढ़ाने पर जोर दिया. बांग्लादेश के माध्यम से अगरतला-कोलकाता सड़क संपर्क जैसे वैकल्पिक मार्गों के विकास पर भी चर्चा हुई, जिससे सिलीगुड़ी कॉरिडोर पर अत्यधिक निर्भरता कम की जा सके.
भू-Political चर्चाओं में चीन की बढ़ती रणनीतिक उपस्थिति, जल सुरक्षा, यारलुंग त्सांगपो नदी से जुड़ी चिंताएं, सिलीगुड़ी कॉरिडोर का महत्व, सीमा पार मादक पदार्थ तस्करी तथा म्यांमार और बांग्लादेश की बदलती Political परिस्थितियों पर भी विचार-विमर्श किया गया.
वक्ताओं ने India की एक्ट ईस्ट नीति और नेबरहुड फर्स्ट नीति को महत्वपूर्ण बताते हुए कहा कि संपर्क परियोजनाओं का लाभ स्थानीय समुदायों तक पहुंचना चाहिए. उन्होंने बिम्सटेक जैसे क्षेत्रीय मंचों के माध्यम से सहयोग बढ़ाने की संभावनाओं पर भी बल दिया.
विशेषज्ञों ने सुझाव दिया कि पूर्वोत्तर राज्यों की भागीदारी India की पड़ोसी देशों के साथ बाहरी सहभागिता को आकार देने में बढ़ाई जानी चाहिए. उन्होंने पैरा-डिप्लोमेसी, संस्थागत सहयोग और स्थानीय भागीदारी को और मजबूत बनाने की आवश्यकता बताई.
दो दिवसीय विमर्श का निष्कर्ष यह रहा कि पूर्वोत्तर India को दक्षिण और दक्षिण-पूर्व एशिया के रणनीतिक प्रवेश द्वार के रूप में विकसित करने के लिए केवल बुनियादी ढांचा निर्माण पर्याप्त नहीं होगा. इसके लिए निरंतर कूटनीतिक संवाद, प्रभावी सीमा प्रशासन, क्षेत्रीय सहयोग, समावेशी विकास और सीमावर्ती समुदायों की सक्रिय भागीदारी सुनिश्चित करनी होगी, ताकि क्षेत्र न केवल कनेक्टिविटी का माध्यम बने बल्कि क्षेत्रीय सहयोग का सबसे बड़ा लाभार्थी भी बन सके.
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डीबीपी


