उत्तराखंड चुनाव 2027: बागेश्वर की दोनों सीटों पर भाजपा का कब्जा, उपचुनाव में भी नहीं जीत पाई कांग्रेस

देहरादून, 2 नवंबर . उत्तराखंड में 2027 में होने वाले विधानसभा चुनाव को लेकर तैयारी तेज हो गई है. Political दलों ने कमर कस ली है. अगर बागेश्वर की बात करें तो यहां विधानसभा की दो सीटें कपकोट और बागेश्वर (सुरक्षित) हैं. 2022 के चुनाव में इन दोनों सीटों को भाजपा ने जीता था.
कपकोट: यहां भाजपा और कांग्रेस के बीच सीधा मुकाबला है. इस सीट पर ज्यादातर भाजपा की जीत हुई है. राज्य गठन के बाद अब तक हुए छह चुनावों में पांच बार भाजपा जीती है, जबकि एक बार कांग्रेस को जीत मिली है. 2022 के चुनाव में भाजपा के सुरेश सिंह गड़िया ने कांग्रेस के ललित मोहन सिंह फर्सवान को 4,046 वोटों से हराया था. सुरेश सिंह को 31,275 वोट मिले थे. वहीं, कांग्रेस के ललित मोहन सिंह फर्सवान को 27,229 वोट मिले थे. तीसरे नंबर पर रहे आम आदमी पार्टी प्रत्याशी भूपेश उपाध्याय को 3,529 वोट मिले थे.
कपकोट विधानसभा सीट पूर्व Governor भगत सिंह कोशियारी का गृह क्षेत्र होने के कारण Political रूप से बेहद संवेदनशील और हाई-प्रोफाइल माना जाता है. कपकोट विधानसभा क्षेत्र में ‘कांडा फैक्टर’ और स्थानीय नेताओं की भीतरघात या लामबंदी चुनावी परिणामों को प्रभावित करती है. इस सीट पर उत्तराखंड क्रांति दल (यूकेडी) की सक्रियता भी बढ़ी है, जिससे मुकाबला बेहद दिलचस्प हो सकता है.
बागेश्वर (सुरक्षित): यह भारतीय जनता पार्टी के वर्चस्व वाली सीट रही है. इस सीट पर 2007 से लेकर 2022 तक भाजपा के चंदन राम दास जीतते रहे, उनके निधन के बाद 2023 के उपचुनाव में चंदन राम दास की पत्नी पार्वती दास को भाजपा ने मैदान में उतारा. पार्वती दास ने भी इस सीट पर जीत दर्ज की. उन्होंने कांग्रेस के बसंत कुमार को 2,405 वोटों से हराया था. उपचुनाव में पार्वती दास को 33,247 वोट मिले थे, जबकि दूसरे नंबर पर बसंत कुमार को 30,842 वोट मिले.
बागेश्वर (सुरक्षित) सीट पर भाजपा की मजबूत संगठनात्मक पकड़ है. भाजपा का बूथ स्तर पर सूक्ष्म प्रबंधन और ग्रामीण अंचल में सड़कों के जाल व विकास कार्यों का प्रसार पार्टी का मुख्य हथियार रहा है. 2022 में भाजपा और कांग्रेस के बीच हार-जीत का अंतर लगभग 12,000 वोटों का था, लेकिन 2023 के उपचुनाव में यह अंतर घटकर केवल 2,405 वोटों पर आ गया. इससे कांग्रेस को इस सीट पर अपनी संभावनाएं नजर आ रही हैं. बागेश्वर की धार्मिक और सांस्कृतिक पहचान भी यहां की राजनीति को प्रभावित करती है.
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एसडी/डीकेपी


