Sunday , 29 March 2020
क्राइम नॉवेल के शौकीनों को अवसाद का खतरा कम, शोध के बाद विशेषज्ञों ने किया दावा

क्राइम नॉवेल के शौकीनों को अवसाद का खतरा कम, शोध के बाद विशेषज्ञों ने किया दावा


लंदन . शोधकर्ताओं का कहना है कि जरूरी नहीं हर तरह के अवसाद, चिड़चिड़पन और घबराहट के मरीजों को दवा की जरूरत हो. इनमें से कुछ को अन्य थेरेपी से भी राहत मिल सकती है. यह शोध इसी अवधारणा की कड़ी है. किताब पढ़ने की थेरेपी को बिबलियोथेरेपी कहते हैं, इसी तरह बात करने की थेरेपी को टॉकिंग थेरेपी कहते हैं. बिबलियो थेरेपी, लंबी अवधि में अवसाद के लक्ष्णों को कम करने में प्रभावी है.

इसके साथ ही मरीज या पीड़ित की दवाओं पर निर्भरता भी कम हो जाती है. प्रयोग के दौरान बिबलियो थेरेपी का इस्तेमाल करने वाले मरीजों के स्वभाव में अंतर दिखाई पड़ा. इनमें से ज्यादातर तीन साल से अधिक समय से अवसाद से जूझ रहे थे.इटली की यूनीवर्सिटी ऑफ ट्यूरिन के शोध में विशेषज्ञों ने दावा किया है कि सनसनीखेज या क्राइम नॉवेल के शौकीन लोगों में अवसाद का खतरा कम रहता है. उनका कहना है यह अवसाद का इलाज तो नहीं है, लेकिन क्राइम नॉवेल पढ़ने वाले लोगों की एंटीडिप्रेसेंट दवाओं पर निर्भरता बहुत कम हो जाती है. हालांकि विशेषज्ञों का कहना है कि किताब पढ़ने से दिमाग पर दबाव कम होता है, जो कई समस्याओं की जड़ होती है. शोध में कहा गया है कि किताबें जिनकी साथी होती हैं उन्हें अवसाद का खतरा भी कम होता है.