Tuesday , 20 October 2020

आरक्षण का लाभ सबसे निचले तबके तक नहीं पहुंच रहा


नई दिल्ली (New Delhi) . आरक्षण का लाभ एससी-एसटी के सबसे निचले स्तर के लोगों तक नहीं पहुंच रहा, क्या हमेशा पिछड़े रहना ही उनकी नियति हो गई है. आरक्षितों के वर्गों में विशेष वर्ग को प्राथमिकता देने के लिए सरकार (Government) को अधिकृत करने का फैसला देने वाली सुप्रीम कोर्ट (Supreme court) की संविधान पीठ ने मामले को बड़ी पीठ को रेफर करते हुए यह टिप्पणी की है. पीठ की इस टिप्पणी से एससी-एसटी आरक्षण में ओबीसी की तरह से क्रीमी लेयर लागू होने का दरवाजा खुल सकता है. केंद्र सरकार (Government) क्रीमी लेयर का विरोध कर रही है और ये मामला पहले से ही सुप्रीम कोर्ट (Supreme court) में लंबित है.

पीठ की ओर से फैसला लिखते हुए जस्टिस अरुण मिश्रा ने कहा कि लाख टके का सवाल यह है कि आरक्षण का लाभ कैसे निचले तबके तक पहुंचाया जाए. रिपोर्ट बताती हैं कि आरक्षण का लाभ लगातार वही ले रहे हैं, जो ऊपर उठ चुके हैं और जो नौकरियों में पर्याप्त प्रतिनिधित्व हासिल कर चुके हैं. जस्टिस मिश्रा ने कहा कि एससी-एसटी और सामाजिक व शैक्षणिक रूप से पिछड़े वर्गों की सूची में बहुत से वर्ग गैरबराबरी पर हैं. अपने 78 पेज के फैसले में पीठ ने कहा कि संविधान के अनुच्छेद 14, 15, 16, 338, 341, 342 और 342ए की व्यापक जनहित में व्याख्या करने का वक्त आ गया है.

इनकी व्याख्या कर इंदिरा साहनी और अन्य फैसलों की बाध्यकारी नजीरों पर पुनर्विचार करने की आवश्यकता है. हालांकि, हम इन फैसलों की पूरी इज्जत करते हैं लेकिन वास्तविक हकीकत से भी नजरें नहीं चुराई जा सकतीं और मूक दर्शक बनकर नहीं रहा जा सकता. बदलती सामाजिक वास्तविकताओं को ध्यान में रखे बिना समाज सुधार के फैसले में पीठ ने इस सवाल पर विचार किया कि क्या आरक्षित वर्गों के किसी वर्ग को प्राथमिकता देना आरक्षित जातियों की सूची में से किसी जाति को निकालना या किसी को शामिल करने जैसा तो नहीं होगा. वह भी तब जब अन्य जातियां आरक्षण से वंचित न हो रही हों. कोर्ट ने कहा कि ईवी चिन्नैया (2004) मामले में जातियों के उपवर्गीकरण पर रोक लगाई गई है.

वहीं जरनैल सिंह (2018) मामले में कोर्ट ने यह राय व्यक्त की थी कि एससी-एसटी आरक्षण में क्रीमी लेयर लागू की जाए. ये लेयर संविधान के अनुच्छेद 341 और 342 के तहत राष्ट्रपति के आदेश से बनी आरक्षितों की सूची से छेड़छाड़ कदापि नहीं करती है. जस्टिस मिश्रा की पीठ ने कहा कि भोजन की पूरी टोकरी जो सभी लोगों की भूख मिटाने के लिए है, क्या सिर्फ सशक्त लोगों आरक्षण का लाभ ले चुके क्रीमी लेयर वाले को हड़पने दी जा सकती है. इसकी अनुमति देना गैर बराबरी को बढ़ावा देना होगा. समानता लाने की आड़ में भोजन की पूरी बास्केट ताकतवरों को नहीं दी जा सकती.