Monday , 28 September 2020

ब्याज को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने सरकार से मांगा यह जवाब


नई दिल्ली (New Delhi) . लोन मोरेटोरियम मामले की सुनवाई करते हुए सुप्रीम कोर्ट (Supreme court) ने केंद्र सरकार (Government) से अपना रुख स्पष्ट करने को कहा है. बुधवार (Wednesday) को इस मामले में कोर्ट ने कहा कि ब्याज पर मोरेटोरियम देने और मोरेटोरियम अवधि में ब्याज पर ब्याज वसूले जाने को लेकर केंद्र सरकार (Government) जवाब दाखिल करते हुए अपना रुख साफ करे. इस मामले की अगली सुनवाई 1 सितंबर को होगी. न्यायमूर्ति अशोक भूषण की अध्यक्षता वाली पीठ ने कहा कि केंद्र ने इस मुद्दे पर अपना रुख स्पष्ट नहीं किया है, जबकि आपदा प्रबंधन अधिनियम के तहत उसके पास पर्याप्त शक्तियां थीं और वह आरबीआई (Reserve Bank of India) के पीछे छिप रही है. इस पर सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने जवाब दाखिल करने के लिए एक सप्ताह का समय मांग, जिसे शीर्ष अदालत ने स्वीकार कर लिया.

मेहता ने कहा, हम आरबीआई (Reserve Bank of India) के साथ मिलकर काम कर रहे हैं. पीठ ने सॉलिसिटर जनरल से कहा कि वे आपदा प्रबंधन अधिनियम पर रुख स्पष्ट करें और यह बताएं कि क्या मौजूदा ब्याज पर अतिरिक्त ब्याज लिया जा सकता है. पीठ में न्यायमूर्ति आर सुभाष रेड्डी और न्यायमूर्ति एम आर शाह भी शामिल हैं. मेहता ने तर्क दिया कि सभी समस्याओं का एक सामान्य समाधान नहीं हो सकता. याचिकाकर्ता की ओर से पेश वरिष्ठ अधिवक्ता कपिल सिब्बल ने पीठ को बताया कि कर्ज की स्थगित किस्तों की अवधि 31 अगस्त को समाप्त हो जाएगी और उन्होंने इसके विस्तार की मांग की. सिब्बल ने कहा, मैं केवल यह कह रहा हूं कि जब तक इन दलीलों पर फैसला नहीं हो जाता, तब तक विस्तार खत्म नहीं होना चाहिए. मामले की अगली सुनवाई एक सितंबर को होगी.

पीठ ने आगरा (Agra) निवासी गजेन्द्र शर्मा की याचिका पर सुनवाई करते हुये यह बात कही. शर्मा ने अपनी याचिका में कहा है कि रिजर्व बैंक (Bank) की 27 मार्च की अधिसूचना में किस्तों की वसूली स्थगित तो की गयी है पर कर्जदारों को इसमें काई ठोस लाभ नहीं दिया गया है. याचिकाकर्ता ने अधिसूचना के उस हिस्से को निकालने के लिये निर्देश देने का आग्रह किया है जिसमें स्थगन अवधि के दौरान कर्ज राशि पर ब्याज वसूले जाने की बात कही गई है. इससे याचिकाकर्ता जो कि एक कर्जदार भी है, का कहना है कि उसके समक्ष कठिनाई पैदा होती है. इससे उसको भारत के संविधान के अनुच्छेद 21 में दिये गये ‘जीवन के अधिकार की गारंटी मामले में रुकावट आड़े आती है. शीर्ष न्यायालय ने इससे पहले कहा था ‘जब एक बार स्थगन तय कर दिया गया है तब उसे उसके उद्देश्य को पूरा करना चाहिये. ऐसे में हमें ब्याज के ऊपर ब्याज वसूले जाने की कोई तुक नजर नहीं आता है.

शीर्ष अदालत का मानना है कि यह पूरी रोक अवधि के दौरान ब्याज को पूरी तरह से छूट का सवाल नहीं है बल्कि यह मामला बैंकों द्वारा बयाज के ऊपर ब्याज वसूले जाने तक सीमित है न्यायालय ने कहा था कि यह चुनौतीपूर्ण समय है ऐसे में यह गंभीर मुद्दा है कि एक तरफ कर्ज किस्त भुगतान को स्थगित किया जा रहा है जबकि दूसरी तरफ उस पर ब्याज लिया जा रहा है. लॉकडाउन (Lockdown) के दौरान लोन की ईएमआई में मिली मोहलत के दौरान इस पर ब्याज लगाने के मामले में सुप्रीम कोर्ट (Supreme court) ने 12 जून को रिजर्व बैंक (Bank) ऑफ इंडिया से सवाल किया था कि क्या ब्याज पर भी मोहलत दी जा सकती है कोर्ट ने वित्त मंत्रालय और रिजर्व बैंक (Bank) ऑफ इंडिया के अधिकारियों से इस पर फैसला लेने को कहा था. सुप्रीम कोर्ट (Supreme court) ने साफ किया कि था वो ब्याज माफ करने के लिए नहीं बल्कि टालने की बात कर रहा है. बता दें कि कोरोना महामारी (Epidemic) को देखते हुए रिजर्व बैंक (Bank) ने होम लोन, पर्सनल लोन, वाहन कर्ज की ईएमआई चुका रहे लोगों को मोरेटोरियम की सुविधा दी थी. इसके मुताबिक उपभोक्ता तय अवधि तक अपनी इएमआई चाहें तो होल्ड कर सकते हैं.