Friday , 27 November 2020

मेवाड़ में शारदीय नवरात्रि की नवमी पर अश्व पूजन एवं विजयादशमी पर खेजड़ी पूजन की सूर्यवंशी परम्परा

उदयपुर (Udaipur). अश्व-गज पूजन – अश्व (घोडा) एवं गज (हाथी), वेदों एवं हिन्दू धर्म ग्रथों में वर्णित प्रमुख पशुओं में माने जाते है, जिनका मनुष्यों के साथ घनिष्ठ संबंध रहा है. अश्व, शक्ति एवं गतिशीलता का प्रतिक है. ऋगवेद के अनुसार, अश्व को सूर्य का प्रतिक भी माना गया है. वैदिक काल में हयग्रीव, अश्व के सिर के साथ विष्णु के अवतार स्वरूप में सफेद अश्व के पूजन का उल्लेख प्राप्त होता है, जो ज्ञान का प्रतिक माना जाता है. हिन्दू परम्परा के अनुसार हाथी शक्ति, ज्ञान एवं ऐश्वर्य का प्रतिक माना जाता है. क्षत्रिय योद्धा के लिये अश्व एवं गज उनके जीवन से जुड़े है, ये युद्ध क्षेत्र में योद्धाओं के मुख्य सहयोगी थे. भारतीय इतिहास में, युद्ध क्षेत्र में गज वाहिनी (हाथियों की सेना) एवं अश्व वाहिनी (घोड़ो की सेना) का उल्लेख बहुलता से मिलता है.

आश्विन माह की शुक्ल पक्ष की नवमी अर्थात् नवरात्रि में अश्व-गज पूजन का विधान है. आश्विन नवरात्रि के दस दिवसीय पर्व में क्षत्रिय साधक शक्ति की उपासना करते है एवं रणक्षेत्र में उनके सहायक अस्त्र-शस्त्र और हाथी, घोड़े का पूजन करते है. मेवाड़ में भी इस परम्परा के साक्ष्य चित्रों के माध्यम से प्राप्त होते हैं जिनमें महाराणा द्वारा अश्व-गज पूजन राजमहलों मे सम्पन्न किया जाता था.

महाराणा शंभुनिवास पैलेस से बग्गी अथवा कार में सवार होकर लवाजमें के साथ जिसमें छड़ी, गोटा व चंवर, कोतल घोड़े, रिसाला के घोड़े, पैलेस बैण्ड एवं सिक्युरिटी गार्ड की टुकड़ी के साथ माणक चौक पधार कर दरीखाने की पोल के आगे स्थित पागड़े पर बिराजते है. माणक चौक में लवाजमे के चपड़ास, मोरछल, मेघाडम्बर, अडाणी, छांगीर, छत्र, सूर्यमुखी, करणिया आदि पहले से ही उपस्थित रहते हैं. शुभ मुहूर्त में पुरोहितजी एवं वैदपाठी ब्राह्मणों द्वारा वैदिक मंत्रोचार के साथ महाराणा विषम संख्या में उपस्थित 3, 5, 7, 9 अथवा 11 अश्वों का एक-एक कर संकल्प के साथ घोड़े को स्नान कराया जाता है फिर वस्त्र धारण करवा उनके तिलक कर उनका पूजन करते है व उन्हें मूंग, चने, गुड़, पुड़ी तथा जवारे खिलाने के पश्चात् अन्त में उनकी आरती करते हैं. पूजन से पूर्व अश्वों को प्रातः लवाजमें के साथ तालाब पर स्नान कराने ले जाने की भी प्रथा थी. वर्तमान में पूजन से पूर्व अश्वों पर जल छिड़कर इस परम्परा का निर्वहन किया जाता है. मेवाड़ की पूर्व परम्परा में पहले अश्व पूजन के पश्चात् महाराणा नगीनाबाड़ी में पधार कर गादी मोड़े के आसन पर बिराज कर वैदिक मंत्रोचार के साथ गज पूजन सम्पन्न करते थे. उसके पश्चात् महाराणा उपस्थित सरदार-उमरावों को बिड़े-कपूर प्रदान कर उन्हें विदा करते थे एवं स्वयं अन्य धार्मिक कार्यों को सम्पन्न करने के लिये पधार जाते थे.

दशहरा पर्व एवं खेजड़ी पूजा

आश्विन शुक्ल दशमी को मनाये जाने वाले विजयदशमी के त्योहार से मेवाड़ राज्य की कई परम्पराएँ जुड़ी हुई है, इन परम्पराओं में ‘अहिड़ा की शिकार’, महत्वपूर्ण अभियान पर प्रस्थान, महाराणा व सरदारों के मध्य सम्बन्ध मजबूत करने के लिए राजमहल में दावत का आयोजन किया जाता था. इस दिन महाराणा सफेद पोशाक व अमरशाही पगड़ी धारण कर राजमहल में ‘पिताम्बरराय जी’ व ‘नागणेची माता’ की पूजा करते थे. उसके पश्चात् महाराणा राजमहल में ‘पागड़ा की हथणी’ से घोड़े पर सवार होकर लवाजमें के साथ हाथीपोल के बाहर खेजड़ी वृक्ष स्थल पर जाते थे, यहाँ द्वार पर लगे तोरण को छू कर दरीखाने में खेजड़ी वृक्ष का पूजन करते थे. आजादी के पूर्व तक इस अवसर पर 100 एवं 150 तोपों कर सलामी दी जाती थी, कालान्तर में 21 तोपों की सलामी होने लगी. इस अवसर पर वैदिक मंत्रों के साथ अभिषेक किये हुए तीर शहर के सभी दरवाजों की ओर भेजे जाते थे जिसका अर्थ था कि, महाराणा का चारों दिशाओं मे यात्रा का मुहूर्त हो चुका है अतः महाराणा किसी भी समय यात्रा के लिए प्रस्थान कर सकते है. इसके बाद दरीखाने में चारण-भाट अपनी रचनाएँ महाराणा के सामने सुनाते थे व इनाम प्राप्त करते थे, अंत में दरीखाना विसर्जित करने से पहले महाराणा सरदारों को सीख के बीड़े देते थे व हाथी पर सवार होकर राजमहल में पधारते थे. इस त्योहार के अवसर पर राजमहल में भी ‘नाहरों का दरीखाना’ नामक स्थान पर दरबार का आयोजन होता था.

 

 

 

 

 

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