Tuesday , 15 June 2021

मैनेजमेंट के खिलाफ रेलवे गार्डों ने काला बैज लगाकर किया विरोध प्रदर्शन

बिलासपुर (Bilaspur) . भारतीय रेल के गार्ड के पास लगभग 30 संरक्षा-उपकरण होते हैं जिनके द्वारा वह रेल -परिचालन की संरक्षा को सुनिश्चित करते हैं. इन उपकरणों में किताबों और फॉर्मों के अलावा डेटोनेटर्स भी होते हैं जो एक प्रकार के विस्फोटक हैं. इन उपकरणों का कुल वजन लगभग 15 किलोग्राम हो जाता है. रेलवे (Railway)के आरंभ से ही उपरोक्त सरकारी संपत्तियों को गार्ड एक स्टील अथवा लोहे के बक्से में सुरक्षित रखते आए हैं. (बहुत पहले लकड़ी के बक्से इस्तेमाल किए जाते थे.) यह बक्से इन उपकरणों को चोरी के साथ-साथ मौसम की मार से भी सुरक्षित रखते हैं. रेलवे (Railway)की शब्दावली में इस बक्से को लाईन-बॉक्स कहा जाता है.

रेलवे (Railway)गार्ड के लिए लगातार 12 घंटे कार्य करना अनिवार्य है जबकि वास्तविकता में यह अवधि 18 घंटे से भी अधिक हो जाती है. इतना ही नहीं, एक गार्ड को 72 घंटे तक घर से बाहर रहना पड़ता है. पूरा देश इस बात से अवगत है कि आजादी के 75 साल बाद भी मालगाड़ी का ब्रेकवान, जहां से गार्ड अपने कत्र्तव्यों का निर्वहन करता है, बिजली-पानी-पंखे और शौचालय की सुविधा से वंचित है. आज तक विभाग के द्वारा इसे सुविधाजनक बनाने का कोई गंभीर प्रयास नहीं किया गया. ऐसी स्थिति में स्वाभाविक रूप से गार्ड को घर से ही दो बैग लेकर चलना पड़ता है. एक में मौसमी सामान, जैसे कि- रेनकोट, छाता, जरकिन, स्वेटर, गर्म कपड़े तथा पानी की बोतलें इत्यादि. बेडशीट, तौलिया, रूमाल, रनिंग रूम में पहनने के लिए कपड़े, चप्पलें, साबुन, टूथब्रश-पेस्ट, कंघी, क्रीम और तेल इत्यादि, शेविंग किट, चार्जर, वॉकी-टॉकी, दवाईयाँ, एक जोड़ी स्पेयर यूनिफॉर्म इत्यादि होते हैं. दूसरे बैग में दो वक्त का भोजन और पीने का पानी होता है. दोनों बैग मिलाकर 12 से 15 किलोग्राम का वजन मौसम के हिसाब से हो ही जाता है.

रेलवे (Railway)बोर्ड की शह पर कई मंडलों ने अपने यहां लाईन-बॉक्स को खत्म कर गार्ड को रेलवे/सरकारी संपत्ति को ढोने के लिए मजबूर किया है. कुछ मंडलों ने इसे ढोने के लिए बैग दे दिया तो बाकियों ने गार्ड को उसके हाल पर छोड़ दिया. किसी प्रकार की मानक प्रक्रिया का पालन नहीं किया गया. एक गार्ड के लिए तीन तीन बैग एक साथ लेकर रनिंग लाईन से होकर मीलों तक पैदल ऊबडख़ाबड़ कीचड़ भरे रास्तों, जिनपर कहीं कहीं घुटनों तक गंदा पानी भरा रहता है, पर चलना और सीढिय़ां चढऩा निश्चित रूप से अत्यंत दुष्कर कार्य है. एक महिला गार्ड के लिए तो स्थिति और भी बदतर हो जाती है.

सभी मान्यताप्राप्त और कैटेगरिकल यूनियनें लाईन-बॉक्स हटाने के प्रशासन के एकतरफा रवैये के खिलाफ हैं. बावजूद इसके रेलवे (Railway)बोर्ड इस मसले पर अतिगोपनीयता बरत रहा है और क्षेत्रीय रेलवे (Railway)तथा मंडलों को लाईन बॉक्स हटाने के लिए निर्देश दे रहा है. जब जमीनी सरोकार शीशे के कक्षों तक पहुंचने में नाकाम रहे तो ऑल इंडिया गाड्र्स काउंसिल ने सर्वसम्मति से उनकी हलचल को तीव्र करने का संकल्प लिया और एक व्यापक अभियान शुरू किया जिसके दूसरे चरण में 23 और 24 मार्च को “काला बैज” धारण करना, 25 मार्च को ईमेल के जरिए व्यक्तिगत प्रतिनिधित्व करना तथा 30 मार्च को सोशल मीडिया (Media) के माध्यम से प्रतिरोध करना शामिल है. 31 मार्च को केंद्रीय कार्यकारिणी की बैठक निर्धारित है जिसमें आंदोलन के आगे की रणनीति तय की जाएगी. यदि आवश्यक प्रतीत हुआ तो हम “वर्क टू रूल’ आंदोलन करने से भी नहीं हिचकिचाएंगे. ट्रेन गार्ड भारतीय रेल के 12 लाख कर्मचारियों के सिर्फ 3त्न हैं और वे कोई वेतन पुनर्निर्धारण अथवा भत्ते की मांग नहीं कर रहे हैं. वे केवल व्यक्तिगत लाईन बॉक्स की पारंपरिक व्यवस्था को जारी रहने देने की इच्छा रखते हैं. यह मामला पहले ही मुख्य केंद्रीय श्रमायुक्त एवं मुख्य रेल संरक्षा आयुक्त के संज्ञान में लाया जा चुका है.

हमारी मांगें इस प्रकार हैं-

मंडलीय अधिकारियों द्वारा गार्ड का उत्पीडऩ बंद करो. लाईन बॉक्स को हटाना बंद करो. जहां कहीं भी लाईन बॉक्स हटा दिए गए हैं, वहां अविलंब लाईन बॉक्स बहाल करो.

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