Thursday , 13 May 2021

किसान आंदोलन: सुप्रिम कोर्ट की भूमिका पर सवाल…?

कटघरे में न्यायपालिका (लेखक-ओमप्रकाश मेहता/ )

किसानों के आंदोलन के पचास दिन बाद अब न्यायपालिका भी मैदान में आ गई है, किसानों को संदेह है कि सरकार जब आंदोलन खत्म कराने के प्रयासों में हार गई तब उसके अनुरोध पर न्यायपालिका को मैदान में आना पड़ा. प्रारंभ में किसानों सहित हर किसी को यह अहसास हुआ कि न्यायपालिका का रूख सरकार विरोधी है, क्योंकि विवादित कानूनों को निरस्त करने या उनके अमल के रूख पर न्यायपालिका का रूख कुछ कड़ा नजर आया, किंतु जैसे ही सुप्रीम कोर्ट (Supreme court) ने इस मसले पर विचार हेतु चाररर सदस्यीय कमेटी के नामों की घोषणा की, वैसे ही हर किसी को यह महसूस हुआ कि यह तो सरकार और सुप्रीम कोर्ट (Supreme court) की मिलीजुली पहल है, क्योंकि उक्त कमेटी के सदस्यों के रूप में जो नाम सामने आए वे सभी सरकार के विवादित कानून अध्यादेश के समर्थक है और इस कानून के समर्थन में कई बार अपनी सहमति व्यक्त कर चुके है. इसलिए जैसे ही उक्त कमेटी के चार सदस्यों सर्व अशोक गुलाटी, डॉ. प्रमोद जोशी, भूपेन्द्र सिंह मान व अनिल धनकट के नामों की घोषणा की गई वैसे ही आंदोलनरत्् किसान संगठनों के तैवर तीखे हो गए और उन्होंने उक्त कमेटी के बहिष्कार की घोषणा कर दी, इसके साथ ही किसान संगठनों ने अपनी एकमात्र विवादित कानूनों की वापसी तक आंदोलन खत्म कर अपने घरों की ओर प्रस्थान की मांग को कड़ाई से दोहरा दिया, अर्थात कानूनों की वापसी तक आंदोलन और तेजी के साथ जारी रखने तथा गणतंत्र दिवस पर दिल्ली में अपनी ट्रेक्टर रैली आयोजित करने की भी घोषणा की.

यद्यपि कमेटी के गठन के साथ ही सुप्रीम कोर्ट (Supreme court) ने विवादित कानूनों के अमल में लाने पर रोक लगा दी और उक्त कमेटी को दस दिन में अपनी पहली बैठक आयोजित करने व दो माह में अपनी रिपोर्ट सुप्रीम कोर्ट (Supreme court) को सौंपने के भी निर्देश दिए, किंतु अब सबसे अहम्् सवाल यह है कि जब कानूनों से प्रभावित आंदोलनरत्् किसानों ने कमेटी के सामने अपना पक्ष रखने से इंकार ही कर दिया तो कमेटी न्यायपूर्ण सुझाव अपनी रिपोर्ट में प्रस्तुत कैसे कर पाएगी? फिर एक चिंतनीय सवाल यह भी है कि इस कानून के समर्थकों को इस कमेटी में मनोनीत क्यों किया गया? क्या इससे न्यायपालिका आरोपों के कटघरें में खड़े रहने को मजबूर नहीं हुई? अब तो आंदोलनरत्् किसानों व प्रेक्षकों का यही विश्वास है कि यह सुप्रीम कोर्ट (Supreme court) व सरकार की मिली जुली प्रक्रिया है, क्या कमेटी के लिए ये विवादित नाम यदि सरकार ने भी दिए थे तो क्या सुप्रीम कोर्ट (Supreme court) को कमेटी की घोषणा के पहले इनका सत्यापन नहीं कर लिया जाना था, फिर यह भी चर्चा का विषय है कि मंगलवार (Tuesday) को जब यह पूरा घटनाक्रम सुप्रीम कोर्ट (Supreme court) में घटित हुआ तब किसानों के वकील साहब कोर्ट व बहस से गायब क्यों रहे? उन्हें एटर्नी जनरल के सवालों का माकूल जवाब किसानों की ओर से नहीं दिना चाहिए था, या किसी ने उन्हें कोर्ट की गतिविधि से बाहर रहने को मजबूर किया?

अब एक ओर अहम्् सवाल इस पूरे घटनाक्रम के बाद हर किसी के जेहन में पैदा हो रहा है और वह यह कि आंदोलनरत्् किसान सुप्रीम कोर्ट (Supreme court) पर अविश्वास की वाणी बोल रहे है और सुप्रीम कोर्ट (Supreme court) की भावना व आदेश की अवज्ञा कर अपने रूख पर अड़े है तो क्या उन पर न्यायालय की अवमानना के तहत कार्यवाही की जाएगी और यदि कार्यवाही की गई तो किसान संघों के पदाधिकारियों पर होगी या सभी आंदोलनरत्् किसानों पर? खैर, इस मसले पर अभी कोर्ट या सरकार ने चिंतन शुरू नहीं किया है, किंतु यह तो तय है कि सरकार यह दांव भी हार रही है और किसान अपने रूख पर दृढ़ है. अब देखना यही दिलचस्प होगा कि आंदोलनरत्् फरियादी किसान ही इस कोर्ट की मशक्कत से दूरर रहते है तो फिर सुप्रीम कोर्ट (Supreme court) की कमेटी अपनी रिपोर्ट में क्या लिखेगी? और कोर्ट इस रिपोर्ट पर क्या कार्यवाही करेगी, और सबसे बड़ी बात आंदोलन का क्या हश्र होगा?

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