Thursday , 25 February 2021

जिस गांव में शिक्षक बनकर गए थे, वहीं पहुंचे कलेक्टर बनकर

रायपुर (Raipur)/महासमुंद . छत्तीसगढ़ (Chhattisgarh) में महासमुंद जिले के गांव सरायपाली में गुरुवार (Thursday) को कलेक्टर (Collector) डोमन सिंह ठाकुर ने पहुंच कर एक पेड़ के नीचे चौपाल लगाई. ग्रामीणों से गांव का हालचाल जाना और आज से करीब 35 साल पहले यहां एक शिक्षक के रूप में पदस्थ होकर जिस खपरैल के एक कच्चे मकान में विद्यार्थियों को पढ़ाया उन बातों को भी ग्रामीणों के समक्ष साझा किया. गुरुवार (Thursday) को कलेक्टर (Collector) ने पिथौरा से करीब आठ किलोमीटर दूर बसे ग्राम पंचायत ठाकुर दिया कला के आश्रित ग्राम सराईपाली में ग्रामीणों के साथ चौपाल लगाने के कार्यक्रम में पहुंचे.

सभी विभागों के ब्लाक और जिला स्तर के अधिकारियों के साथ पहुंचे कलेक्टर (Collector) ने सरायपाली बस्ती के मध्य एक पेड़ के नीचे चौपाल लगाकर उनका हालचाल जाना. सभी विभागों के द्वारा ग्रामीणों के लिए दी जाने वाली योजनाओं के क्रियान्वयन एवं उसकी प्रगति के बारे में भी बारी-बारी से जानकारी ली. दोपहर करीब डेढ़ बजे ग्राम सरायपाली पहुंचकर अपनी वाहन को गांव के प्राथमिक शाला के सामने रुकवा कर चौपाल स्थान पर पहुंचने के पहले गांव के भ्रमण पर निकल गए. रास्ते पर मिलने वाले ग्रामीणों विशेषकर वृद्धजनों से उन्होंने 35 साल पहले गांव में संचालित हो रहे एक स्कूल के बारे में जानकारी ली जो खपरैल के कच्चे मकान में संचालित हो रही थी.

ग्रामीणों के बताने के मुताबिक उस मकान तक पहुंच गए जो आज भी मकान कच्चा है और खपरैल वाला है. इसी से लगकर एक मकान की भी उन्होंने तलाश की जो दो कमरे वाला एक मकान हुआ करता था, हालांकि अब यह मकान पक्का बनाया जा चुका है किंतु उस मकान में भी कलेक्टर (Collector) के पुराने दिनों की यादें छिपी हुई हैं. उस मकान के सामने भी खड़े होकर कलेक्टर (Collector) ने फोटो खिंचवाई. यहां वर्तमान में संचालित प्राथमिक शाला प्रांगण में पहुंचकर यहां के विद्यार्थियों से रूबरू होते हुए शाला भवन का भी निरीक्षण किया तथा जर्जर हालत को देखते हुए उक्त शाला भवन को अब माडल भवन के रूप में विकसित करने के निर्देश विभाग के अधिकारियों को दिए हैं. यहां के विद्यार्थियों के साथ खड़े होकर उन्होंने फोटो भी खिंचवाई. इसके बाद ग्राम के चौपाल में पहुंचकर ग्रामीणों से रूबरू होते हुए उन्होंने ग्रामीणों को अवगत कराया कि आज से करीब 35 साल पहले वे यहां एक शिक्षक के रूप में पदस्थ होकर करीब तीन महीने की अपनी सेवाएं दी है. उन दिनों यहां पहुंचने के लिए न तो सड़क थी और ना ही इस गांव में स्कूल का भवन था. लिहाजा ग्रामीणों के द्वारा दिए गए एक खपरैल वाले कच्चे मकान में ही स्कूल का संचालन हुआ करता था यहां पदस्थ होने वाले शिक्षक के लिए भी ग्रामीणों के द्वारा एक कच्चे मकान को उपलब्ध कराया गया था जहां शिक्षक रहकर अपनी सेवाएं दिया करते थे. वर्ष 86-87 में भी वे भी एक शिक्षक के रूप में यहां पदस्थ हुए थे.

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