Saturday , 19 June 2021

आज से होलाष्टक प्रारम्भ

जबलपुर, 21 मार्च . आज से होलाष्टक प्रारंभ हो रहा है. होलाष्टक में अगले 8 दिनों तक शुभ कार्य वर्जित रहेंगे. होलाष्टक में शादी, विवाह, गृह प्रवेश, आदि शुभ कार्य पर रोक रहती है. पंडित पीएल गौतामाचार्य के मुताबिक फाल्गुन मास के शुक्ल पक्ष की अष्टमी से लेकर पूर्णिमा तिथि तक होलाष्टक माना जाता है. होलाष्टक होली दहन से पहले के 8 दिनों को कहा जाता है. इस बार 22 मार्च से 28 मार्च तक होलाष्टक रहेगा. इस वर्ष होलिका दहन 28 मार्च को किया जाएगा और इसके बाद अगले दिन रंगों वाली होली खेली जाएगी.

ये कार्य रहते हैं वर्जित……….

विवाह करना, वाहन खरीदना, घर खरीदना, भूमि पूजन, गृहप्रवेश, 16 संस्कार यज्ञ, हवन या होम, नया व्यापार शुरु करना
नए वस्त्र या कोई वस्तु खरीदना, यात्रा करना, होलाष्टक को ज्योतिष की दृष्टि में एक दोष माना जाता है. विवाहिताओं को इस दौरान मायके में रहने की सलाह दी जाती है.

ग्रहों की स्थिति………

इस वर्ष होलाष्टक का आरंभ 22 मार्च से होने जा रहा है. यह फाल्गुन मास की शुक्ल पक्ष की अष्टमी तिथि रहेगी. इस तिथि पर चंद्रमा मिथुन राशि में विराजमान रहेंगे. आद्र्रा नक्षत्र रहेगा. वृष राशि में राहु और मंगल, वृश्चिक राशि में केतु, मकर राशि में गुरू और शनि, कुंभ राशि में बुध और मीन राशि में सूर्य व शुक्र विराजमान रहेंगे.

ज्योतिषीय धारणा…………

होलाष्टक का प्रभाव तीर्थ क्षेत्र में नहीं माना जाता है. लेकिन इन 8 दिनों तक मौसम परिवर्तित हो रहा होता है. सर्दी जा चुकी होती है व गर्मी प्रारम्भ हो जाती है. सुहावने वसन्त के पश्चात सब उदस से होने लगता है. भोजन में सर्दियों की सब्जियां बेस्वाद हो जाती हैं व गर्मी की सब्जियां अभी आने में समय होता है. इसलिए शरीर भी रोगों से प्रेरित रहता है. मन भी अवसाद की ओर प्रेरित रहता है. ऐसे में स्वयं के शरीर व मन का ध्यान रखना आवश्यक हो जाता है. अतः शुभ कार्य वर्जित माने गए हैं.

होलाष्टक के आठ दिनों में व्रत, पूजन और हवन की दृष्टि से अच्छा समय माना गया है. ज्योतिष विज्ञान के अनुसार अष्टमी को चंद्रमा, नवमी तिथि को सूर्य, दशमी को शनि, एकादशी को शुक्र और द्वादशी को गुरु, त्रयोदशी को बुध, चतुर्दशी को मंगल तथा पूर्णिमा को राहु उग्र स्वभाव के हो जाते हैं. इन ग्रहों के निर्बल होने से मनुष्य की निणNय क्षमता निर्बल हो जाती है जिसके चलते मनुष्य अपने स्वभाव के विपरीत फैसले लेने लगता है. यही कारण है कि व्यक्ति के मन को रंगों और उत्साह की ओर मोड़ दिया जाता है.

क्यों कहते हैं इसे होलाष्टक………..

पहली कथा के अनुसार, भक्त प्रहलाद को उसके पिता ने हिरण्यकश्यप ने अपने पुत्र की भक्ति को भंग करने और उनका ध्यान अपनी और करने के लिए लगातार 8 दिनों तक उन्हें हर सम्भव यातनाएं और कष्ट दिए थे. भक्त प्रह्लाद ने उस दौरान हरि का ध्यान किया व अंत में उनके दर्शन प्राप्त किये. अतः यह समय हरि विष्णु का ध्यान करने का माना जाता है. इसलिए कहा जाता है कि, होलाष्टक के इन 8 दिनों में किसी भी तरह का कोई शुभ कार्य नहीं करना चाहिए. यह 8 दिन वहीं होलाष्टक के दिन है. होलिका दहन के बाद ही जब प्रहलाद जीवित बच जाते है तो उनकी जान बच जाने की खुशी में ही दूसरे दिन रंगों की होली मनाई जाती है. वहीं दूसरी कथा के अनुसार देवताओं के कहने पर शिवजी की तपस्या भंग करने के कारण जब कामदेव को शिवजी अपने तीसरे नेत्र से भस्म कर देते हैं तब कामदेव की पत्नी शिवजी से उन्हें पुनर्जीवित करने की प्रार्थना करती है. रति की भक्ति को देखकर शिवजी इस दिन कामदेव को दूसरा जन्म में उन्हें फिर से रति मिलन का वचन दे देते हैं. कामदेव बाद में श्रीकृष्ण के यहां प्रद्युम्न रूप में जन्म लेते हैं.

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