Saturday , 6 March 2021

2026 में बस जाएगी मंगल और गुरू के बीच इंसानी बस्ती- फिनलैंड के वैज्ञानिक ने किया दावा

डिस्क के आकार के आवास में हजारों बेलनाकार संरचनाएं होंगी, हर एक में 50 हजार लोग रह सकेंगे

लंदन . कई लोगों को लग रहा हो कि वैज्ञानिक अनुसंधान और शोधों का ध्यान अब अंतरिक्ष से हटकर पृथ्वी की जलवायु परिवर्तन पर ज्यादा होने वाला है. फिर भी अंतरिक्ष अनुसंधान पर हो रहे शोधों में कमी आएगी इसकी संभावना कम ही है. दुनिया के तमाम देशों के मंगल और अन्य अंतरिक्ष अनुसंधान योजनाओं पर काम करते ही रहेंगे जो बहुत दूरगामी हैं. इसी बीच फिनलैंड के एक वैज्ञानिक ने अपने तर्कों के साथ दिलचस्प दावा किया है कि साल 2026 तक मंगल और गुरू ग्रह के बीच इंसानी बस्ती बस सकती है. वैज्ञानिक डॉ पेक्का जेनह्यूनेन ने दावा किया है कि मंगल और गुरू ग्रह के बीच क्षुद्रग्रहों की पट्टी में एक बड़े पिंड में इंसान की बस्ती बसाई जा सकती है. जेनह्यूनेन एक अंतरिक्ष भौतिकविद, खगोलजीवविज्ञानी और आविष्कारक हैं. यही वजह है कि उनका यह दावा भले ही कितना अव्यवहारिक या असंभव लगे, लेकिन लोगों का ध्यान खीचने में सफल रहा है.

न्यूयार्क पोस्ट की रिपोर्ट के मुताबिक जेनह्यूनेन ने इस महीने अपने एक शोधपत्र में तैरते हुए विशाल सैटेलाइट पर एक रूपरेखा तक पेश की है. वैज्ञानिक का कहना है कि पृथ्वी से 32.5 करोड़ मील दूर सीरेस नाम के बौने ग्रह के आसपास सैटेलाइट घूमेंगे. इससे वहां कृत्रिम गुरुत्व की मदद से वहां बसाहट के लिए प्रेरणा मिलेगी. फिलहाल पृथ्वी के बाहर की बसाहट का ज्यादातर ध्यान चंद्रमा और मंगल ग्रह के बारे में है क्योंकि ये दोनों पृथ्वी से ज्यादा दूर नहीं हैं. यह सब कैसे संभव है, इस सवाल का जवाब देते हुए जेनह्यूनेन ने एक डिस्क के आकार के आवास का पूर्वानुमान लगाया है जिसमें हजारों बेलनाकार की फली जैसी संरचनाएं होंगी, जिसमें हर एक में 50 हजार लोग रह सकेंगे. हर फली शक्तिशाली चुंबक से जुड़ी होंगी जिससे धूर्णन पैदा होगा और कृत्रिम गुरुत्व बनेगा.

आज से 15 साल बाद सीरेस की सतह के 600 मील के नीचे तक उत्खनन कर सकेंगे और उसे अंतरिक्षीय एलीवेटर्स का उपयोग कर ऊपर ला सकेंगे. जेनह्यूनेन का कहना है कि सेरेस से सामग्री उठाना ऊर्जा के लिहाज से सस्ता पड़ेगा. सीरेस का गुरुत्व कम है और तुलनात्मक रूप से तेजी से घूमता है, वहां स्पेस एलीवेटर उपयुक्त होंगे. सीरेस क्षुद्रग्रह की पट्टी में सबसे विशाल पिंड है. इसके नाइट्रोजन सम्पन्न वायुमंडल के कारण यह पृथ्वी से बाहर बसाहट के लिहाज से उपयुक्त है.

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