Wednesday , 16 June 2021

खदानों से 500 करोड़ कमाने का सपना पूरा होने में संदेह

भोपाल (Bhopal) . राज्य सरकार (State government) का ख‎‎निज खदानों से 500 करोड कमाने का सपना पूरा होने में संदेह जताया जा रहा है. प्रदेश के खाली खजाने को गौण खनिजों के जरिये भरने की कोशिश कर रही राज्य सरकार (State government) के हाथ खाली रहने की आशंका है. प्रदेश में मौजूद चार हजार में से करीब तीन हजार खदानों में वनभूमि का पेच फंसा हुआ है, तो 700 खदानें संरक्षित क्षेत्र के अंदर या सटकर हैं. जिनमें उत्खनन की अनुमति राज्य वन्य जीव मंडल की सिफारिश पर ही निर्भर करेगी, जो आसान नहीं है. केंद्र सरकार (Central Government)ने वर्ष 2016 में 31 बड़े खनिजों को गौण खनिजों में परिवर्तित कर दिया है. अब इनकी नीलामी के अधिकार राज्य सरकार (State government) को हैं.

चार साल से प्रदेश सरकार इनके नियम बना रही थी, पर कोरोना काल में सरकारी खजाने की स्थिति और बिगड़ी, तो सरकार ने आनन-फानन में जनवरी 2021 में नियम जारी कर दिए और सभी जिलों को खदानों की आवंटन प्रक्रिया शुरू करने को कहा. आवेदन मिलने के बाद आवंटन के लिए पड़ताल करने पर पता चल रहा है कि ज्यादातर खदानें वनभूमि में मौजूद हैं. कुछ खदानें राजस्व भूमि में हैं, तो उनका कुछ हिस्सा वनभूमि में भी आता है. सबसे ज्यादा समस्या संरक्षित क्षेत्र (टाइगर रिजर्व, नेशनल पार्क और अभयारण्य) से सटी खदानों में आना है. ऐसी ही डोलोमाइट की एक खदान कान्हा टाइगर रिजर्व के इको सेंसेटिव जोन में बताई जा रही है. जिसका प्रस्ताव ग्राम पंचायत ने तैयार किया है.

इन खदानों पर भारतीय वन्यजीव संरक्षण अधिनियम 1972 के नियम लागू होते हैं, जो किसी भी परिस्थिति में उत्खनन या कटाई की इजाजत नहीं देते हैं. ऐसी करीब 700 खदानों के आवंटन में दिक्कत आना है. अब इन खदानों के आवंटन को लेकर भले ही केंद्र सरकार (Central Government)के पास न जाना पड़े, पर संरक्षित क्षेत्र और उसके आसपास खनन की अनुमति के लिए तो केंद्र सरकार (Central Government)के पास जाना ही पड़ेगा. ऐसे में राज्य वन्य जीव मंडल की सहमति के बाद प्रकरण केंद्रीय पर्यावरण, वन और जलवायु परिवर्तन मंत्रालय को भेजा जाएगा. वहां से सहमति बनने के बाद ही आवंटन पर अंतिम मुहर लगेगी. संचालक खनिज विनीत ऑस्टिन के पास इस सवाल का कोई जवाब नहीं है. ऐसे प्रकरणों में पर्यावरण अनुमति लेना भी आसान नहीं होगा क्योंकि मामला केंद्र तक जाना है. इस बारे में वन बल प्रमुख मप्र राजेश श्रीवास्तव का कहना है ‎कि यदि वनभूमि में खदान है, तो अनुमति लेना ही पड़ेगी. उस समय कानूनी दिक्कतें देखी जाएंगी. यदि कानून में नहीं आ रहा है, तो अनुमति नहीं देंगे.

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