Sunday , 20 September 2020

बोइंग-बोइंग से गरम मसाला तक


  लेखकचन्दन कुमार जांगिड़

  • फ़िल्मगरम मसाला (रोम-कॉम)

(नोटयदि अबतक आपने फ़िल्म नही देखी तो सार तक पढ़कर वापस लौट जावे.)

 कास्टअक्षय कुमार (मकरंद दीनदयाल छटपटिया उर्फ़ मैक), जॉन अब्राहम (श्याम उर्फ सैम), परेश रावल (मैम्बो), रिमी सेन (अंजलि), राजपाल यादव (बब्बन), नेहा धूपिया (मैगी), नीतू चन्द्रा (स्वीटी), डेज़ी बोपन्ना (दीप्ती), नरगिस बाघेरी (पूजा).

अन्यअसरानी (मैक के मामा), लक्ष्मी पंडित, मनोज जोशी, विजू खोटे.

डायरेक्टरप्रियदर्शन.

स्क्रीनप्ले कहानी प्रियदर्शन.

 

  • सिनेमाई रूपांतरणगरम मसाला फ़िल्म का सिनेमाई रूपांतरण विश्व प्रसिद्ध नाटक बोइंग-बोइंग से किया गया है. बोइंग-बोइंग नाटक सन 1960 में फ्रेंच लेखक मार्क कैमोलेटी द्वारा लिखा गया था. जिसका बाद में अंग्रेज़ी में अनुवाद बेवरले क्रॉस द्वारा किया गया.

 

  • कहानी सारश्याम (जॉन अब्राहम) और मकरंद (अक्षय कुमार), एक ही कंपनी के दो फोटोग्राफर दोस्त है, जो कि दोस्त कम एक दूसरे के दुश्मन ज़्यादा है. दोनो महिलाओं के साथ फ्लर्ट करना पसंद करते हैं. विदेश यात्रा के बाद, जब श्याम मकरन्द को तीन महिलाओं के साथ रिलेशनशिप का झूंठा ढोंग करते देखता है तब श्याम मकरंद से ईर्ष्या पाकर मकरन्द के जीवन को बाधित करने का फैसला करता है.

 

  • फ़िल्म रिव्यु

कंटेंट क्राफ्टचूंकि कहानी 1960 में लिखी गई थी और एक फ्रेंच कहानी है तो यूरोपियन होने के कारण अंग्रेज़ी अनुवाद में इतने बदलाव नही हुए किन्तु जब कहानी को हिंदी में बदला गया तो भारतीय दर्शकों के हिसाब से काफी कुछ बदलाव किए गए. जैसे कि

-कहानी चूंकि दक्षिणी वयस्क दर्शकों के लिए है, उसे भारतीय 14 वर्ष से ऊपर के लोगो के लिए बनाया गया. नाटक वैसे एक सेक्सुअल कॉमेडी पर भी चलता है जिसमे दक्षिणी संस्कृति के हिसाब से मानसिक खुलापन होता है जैसे कि काफी सारे किसेज़ के दृश्य, रिलेशनशिप के हिसाब से इंटिमेट दृश्य इत्यादि. जबकि फ़िल्म को पारिवारिक मनोरंजन के हिसाब से बदला गया जिसमें की एक भी किस का दृश्य नही है.

-कहानी में कुछ अन्य किरदार भी डाले गए है जैसे कि राजपाल यादव, असरानी, रिमी सेन, कुछ किरदारों में बदलाव किए गए जैसे कि परेश रावल का किरदार (नाटक में यह किरदार एक लड़की का है) और साथ ही कहानी को भारतीय मुख्यधारा की कहानी बनानी थी इसलिए कहानी में रिमी सेन के साथ मकरन्द की एक अलग प्रेम कहानी का दृष्टिकोण भी डाला गया है.

कहानी में लव स्टोरी व ड्रामेटिक तत्वों का दृष्टिकोण देकर काहानी को बॉलीवुड (Bollywood) सिनेमा के हिसाब से मसालेदार बनाया गया है. परेश रावल, असरानी व राजपाल यादव का किरदार प्रमुखतः हमे प्रियदर्शन के रचे गए किरदारों एवं प्रियदर्शन के हास्य को वर्णित करने का भाव दे जाते है. चूंकि नाटक में परेश रावल का किरदार मुख्य किरदारों से खुलकर बातचीत करता है जबकि फ़िल्म में परेश रावल को एक परेशान रसौइया दिखाया है जिसकी हर बात पर आपको मज़ा आता है.

नाटक में प्रमुख किरदारों में आपसी मतभेद नही होते जबकि फ़िल्म के पहले दृश्य से दोनो के मतभेद व ईर्ष्या को दिखाया जाता है. ये मतभेद भी प्रियदर्शन के रचे हुए मतभेद की तरह है, जिनमे आपको हर हरकत पर हंसी आती है.

– नाटक में लड़कों के (बेनार्ट व रोबर्ट) दोनो किरदारों को समान समय दिया गया है, नाटक में किसी भी तरह नज़र नही आता कि कौन प्रमुख किरदार है. किन्तु फ़िल्म में अक्षय कुमार को प्रमुख किरदार के तौर पर दर्शाया गया है. गरम मसाला पूरी तरह से अक्षय कुमार के इर्द गिर्द घूमती है इसलिए उन्हें जॉन अब्राहिम से ज़्यादा फ्रेम्स व समय मिलता है.

निर्देशनचूंकि यह एक हास्य सिनेमा है इसलिए निर्देशक ने चीज़ों को एक हद्द तक तर्कसंगत रखा है. निर्देशक प्रियदर्शन अपने इलाके में खलते से नज़र आए, वो ऐसे की उन्हें पता था कि हास्य फ़िल्म में लोग हसने पर ज़्यादा और तर्क ढूंढने में कम समय लगाएंगे. जैसे कि मकरन्द को बंगला यूं ही चुटकी में हास्यीकरण से मिल जाता है. मकरन्द को लड़कियों में इतना व्यस्त दिखाया गया है पर वह कमाई करने कब जाता है (नाटक में भी यही भूल है), और उसके पास लूटाने के लिए इतना पैसा कहां से आता है? पर प्रियदर्शन इन सबमे बहुत ही आसानी से बाज़ी मारते गए नज़र आते है, उन्होंने इतना कूट-कूटकर हास्य भरा है कि आप हसने में इतने व्यस्त होते हो कि आपका इनमे से किसी तरफ़ ध्यान ही नही जाता है. कहानी एक लय में चलती हुई नज़र आती है जो कि शुरू से हास्य, ड्रामा और रोमांस के एक बीज के साथ शुरू होती है और अंत तक हास्य के पेड़ में बदल जाती है जहां रोमांस व ड्रामा एक छोटी पत्ती की तरह बना रहता है.

-प्रियदर्शन ने कहानी को इस तरह से बनाया है कि फ़िल्म में नाटक की चीज़े भी खत्म नही होती जैसे कि मकरन्द का अपनी डायरी में लिखना, शराब पीने के दृश्य, तस्वीर बदलने के दृश्य और भी बहुत कुछ.

संगीतयदि फ़िल्म की कहानी में दम हो और वो अपने रास्ते पर एक दम सटीक चल रही हो फिर यदि उसमे संगीत झुमाने वाला व लुभावना मिल जाता है तो चार चांद लग जाते है. फ़िल्म का संगीत कमाल है. भारतीय सिनेमा में संगीत एक अलग साधन है जो कि आपको झूमाते हुए आपके दिमाग मे बहुत सारी बाते 3-5 मिनट में ही डाल जाता है. यहां भी निर्देशक ने फ़िल्म के संगीत का बहुत ही कमाल तरह से उपयोग किया है. फ़िल्म में चार गाने है

  1. अदा- यह गाना फ़िल्म की एकदम शुरुआत में आता है जिसका प्रयोग निर्देशक ने प्रमुख दोनो किरदारों की नियति, उनका चरित्र एवं वे क्या काम करते है यह दिखाने में इस्तेमाल किया है. साथ ही पहले दृश्य से प्रियदर्शन अपनी फिल्म के लक्ष्य को दर्शकों के दिमाग मे डालना शुरू कर देते है.
  2. चोरी-चोरी- गाना अक्षय कुमार की छुटती अथॉरिटी एवं जॉन अब्राहम से उसकी ईर्ष्या के कारण को बयां करता है.
  3. फलक देखूं- यह गाना अक्षय कुमार व उसकी तीन प्रेमिकाओं के मध्य मचने वाली भसड़ को स्थापित करता है.
  4. दिल समंदर- यह गाना श्याम और मकरन्द के दोबारा मिलन व आने वाली हरकतों के बारे में बयां करता है.

अभिनअक्षय कुमार का सबसे पसंदीदा जॉनर कॉमेडी है और अगर वह प्रियदर्शन की कॉमेडी फिल्म हो तो फिर चार चांद लग जाते है. फ़िल्म में अक्षय कुमार, परेश रावल,मनोज जोशी व राजपाल यादव कमाल लगते है. वहीं जॉन अब्राहम कॉमेडी करते हुए कमज़ोर नज़र आते है. रिमी सैन को बॉलीवुड (Bollywood) के हिसाब से ही कम फ्रेम दिए गए है तो उनके अभिनय पर बात करने का कोई अर्थ नही होता. शेष तीनो अभिनेत्रियो नीतू चंद्रा, डेज़ी बोपन्ना व नरगिस बाघेरी ने भी शानदार अभिनय किया है.