Friday , 25 September 2020

गाजर घास उन्मूलन के लिए सामूहिक प्रयासों की आवश्यकता

 

उदयपुर. महाराणा प्रताप कृषि एवं प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय, उदयपुर के तत्वावधान मे गाजर घास जागरूकता सप्ताह का आयोजन अखिल भारतीय समन्वित खरपतवार प्रबंधन अनुसंधान परियोजना, अनुसंधान निदेशालय उदयपुर द्वारा 16 से 22 अगस्त, 2020 को किया जा रहा हैं. कोविड-19 के मद्देनजर इस कार्यक्रम को सामाजिक दूरी बनाते हुए भौतिक रूप के साथ-साथ ऑनलाइन रूप में भी आयोजित किया गया. सप्ताह पर्यन्त चलने वाले इस कार्यक्रम में एमपीयूएटी, उदयपुर के कुलपति डॉ. नरेंद्र सिंह राठौड़ ने इस खरपतवार से होनेवाले नुकसान की विस्तृत विवेचना करते हुए इसके उन्मूलन हेतु वर्ष पर्यन्त क्रियाश्शील रहने का आवहान् किया और साथ ही कहा कि 30 वर्षों से गाजरघास की समस्या गांव के साथ-साथ शहरों में भी ज्वलंत हो गई है.

विश्वविद्यालय इसके उन्मूलन हेतु समन्वित नियंत्रण विधी क® अपनाते हुए जिसमे हाथ से उखाड़ना, स्प्रे करना, ब्रुशकटर द्वारा काटना, गेंदा व केशियातौरा जैसे प्रतिस्पर्धा पौधे लगाना इत्यादि से समस्या को नियंत्रित करने के लिऐ सक्रिय रूप से प्रयासरत है और यह तभी संभव हो सकता है जब हम सभी लोगों की इसमें भागीदारी हो . यह पौधा बहुत ही शीघ्रता से बढ़ता है और इसके एक पौधे से हजारों बीज उत्पन्न होते हैं जो अगले हजार पौधे पैदा करने की क्षमता रखते हैं. इससे खेती के साथ-साथ मानव स्वास्थ्य में भी दुष्प्रभाव बढ़ रहे हैं जिससे लोगों में एलर्जी चर्मरोग और श्वास संबंधित रोग जैसे अस्थमा आदि बढ़ रहे हैं. किसान यदि छोटी अवस्था में इसे उखाड़ कर फेंक दे या फिर इसका कम्पोस्ट बना कर इसका सदुपयोग करें तो हम इस समस्या से निजात पा सकते हैं. इस अवसर पर डॉ. राठौड़ ने सभी ल®ग®ं से यह अपिल की एक व्यक्ति तीन अन्य व्यक्तियों को इसकी जानकारी दे ताकि ज्यादा से ज्यादा लोगों को हम जागरुक कर सकें और हम जल्दी से जल्दी इस ज्वलंत समस्या का निदान कर पाए. इस अवसर पर आयोजित प्रदर्शनी में गाजर घास से होने वाले नुकसान व उसके समन्वित प्रबन्धन को विस्तार से समझाया गया.

अनुसंधान निदेशक डॉ. ए. के. महता ने कहा कि गाजर घास जागरूकता सप्ताह की जगह अब समय आ गया है, इसके उन्मूलन को अभियान के रूप में लेना चाहिये. साथ ही उन्होंने बताया कि अल्पकाल में ही गाजर घास पूरे देश में एक भीषण प्रकोप की तरह लगभग 35-40 मिलीयन हैक्टेयर भूमि पर फैल चुकी है. डॉ. महता ने गाजर घास से होने वाले नुकसान के प्रति जागरूक रहने का स्पष्ट संदेश देते हुए कहा कि विगत 14 वर्षों से इस कार्यक्रम को संचालित किया जाता रहा है जिसके फलस्वरूप महाविद्यालय परिसर में गाजर घास के संक्रमण में सार्थक कमी आयी है परन्तु इस कार्यक्रम की सार्थकता व्यापक क्षेत्र के परिपेक्ष्य में देखी जानी चाहिए. अतः इस दिशा में हमें अथक प्रयास करने होगें. इस अवसर पर क्षेत्रिय निदेशक अनुसंधान डॉ. एस. के.शर्मा ने गाजर घास द्वारा कैसे बायोचार बनाकर ऊर्जा में परिवर्तीत कर उपयोग करने की जानकारी दी.

राजस्थान कृशि महाविद्यालय के अधिष्ठाता डॉ. अरूनाभ जोशी ने गाजर घास की जैव रसायनिक गुणों की चर्चा करते हुए सभी का धन्यवाद ज्ञापित किया. पूर्व में इस अवसर पर खरपतवार प्रबन्धन परियोजना के परियोजना अधिकारी डॉ. अरविन्द वर्मा ने महाविद्यालय के विभिन्न विभागों के सदस्यगण एवं कर्मचारियों को गाजरघास की तकनीकी पहलूओं तथा इसके नियंत्रण के विभिन्न आयामों की विस्तृत रूप से चर्चा की. कार्यक्रम में सस्य विज्ञान के विभागाध्यक्ष, डॉ. दिलीप सिंह, परियोजना की सहप्रभारी, डॉ. रोशन चौधरी सहित बड़ी संख्या में राजस्थान कृशि महाविद्यालय के सभी विभागों के सदस्यगण व विधार्थियों ने श्रमदान कर महाविद्यालय परिसर में गाजरघास उखाड़ी. इस कार्यक्रम में गाजरघास पर तकनिकी फ®ल्डर का भी विम®चन किया गया. इस कार्यक्रम में विश्वविद्यालय के कर्मचारियों के द्वारा भौतिक रूप से साथ-साथ, विद्यार्थियों तथा कृषि विज्ञान केंद्रों के सदस्यगण तथा उनके माध्यम से सात जिल®ं के किसानों के साथ 128 लोगों नें भाग लिया .